भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्याय ४७ कामद पीठ करणपीठ प्रासाद और भवन ( गृह ) आदि सब मे पीठका आधार हैं, यदि पीठ न होवे तो ये निराधार माने जाते है। इसलिये विना पीठ वाले ये प्रासाद और गृह आदि थोडे समय मे ही नष्ट हो जाते है ॥१४॥ प्रासाद का उदयमान ( मंडोवर )— हस्तादिपञ्चपर्यन्तं विस्तारेणोदयः समः । स क्रमान्नवसप्तेषु-रामचन्द्राङ्गुलाधिकः ॥१५॥ पञ्चादिदशपर्यन्तं त्रिंशाद्यावच्छताद्र्धकम् । हस्ते हस्ते क्रमाद् वृद्धिर्मनुसूर्य्यनवाङ्गुला ॥१६॥ एक से पांच हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय विस्तार के बराबर मान का बनावें, परन्तु उनमे क्रमश: नव, सात, पाच, तीन और एक अंगुल बढ़ा करके बनावे । अर्थात् प्रासाद का विस्तार एक हाथ का हो तो उसका उदय एक हाथ और नव अंगुल ( कुल ३३ अंगुल ), दो हाथ का हो तो दो हाथ और सात अगुल ( कुल ५५ अंगुल ), तीन हाथ का हो तो तीन हाथ और पांच अंगुल ( कुल ७७ अंगुल ), चार हाथ का हो तो चार हाथ और तीन अगुल ( कुल ९९ अंगुल ) और पाच हाथ का हो तो पाच हाथ और एक अंगुल ( कुल १२१ अंगुल ) का उदय रक्खे । छह से दस हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ चौदह २ अंगुल, ग्यारह से तीस हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ