प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ प्रासादमण्डने
का निर्गम रक्खे। उदय के तरेपन भाग में से नव भाग का जाड्यकुम्भ, सात भाग की अन्तरपत्र के साथ कर्णिका, सात भाग की कपोतालि के साथ ग्रासपट्टी, इसके ऊपर बारह भाग का गजथर, दश भाग का अश्वथर, और आठ भाग का नरथर बनावे। अश्वथर के स्थान पर देव के वाहन का भी थर बना सकते है ॥७ से ६॥ थरों का निर्गममान— पञ्चांशा कर्णिकाग्रे तु निर्गमो जाड्यकुम्भकः । त्रिसाद्धा कर्णिका सार्धा चतुर्भिर्ग्रासपट्टिका ॥१०॥ कुञ्जराश्वनरा वेदा रामयुग्मांशनिर्गमाः । अन्तशालमधस्तेषा-मूर्ध्वाधः कर्णयुग्मकम् ॥११॥ कर्णिकासे आगे पांच भाग निकलता जाड्यकुम्भ, ग्रासपट्टी से आगे साढे तीन भाग निकलती कर्णिका, गजथर से आगे साढे चार भाग निकलती ग्रासपट्टी, अश्वथरसे आगे चार भाग निकलता गजथर, नर थरसे आगे तीन भाग निकलता अश्वथर और खुरासे आगे दो भाग निकलता नर थर रखे। इस प्रकार बाईस भाग पीठ का निर्गम जाने। इन गजादि थरों के नीचे अंतराल रक्खे और अंतराल के ऊपर और नीचे दो दो कर्णिका बनावें ॥१०-११॥ कामदपीठ और कणपीठ (साधारणपीठ)— गजपीठं विना स्वल्प-द्रव्ये पुण्यं महत्तरम् । जाड्यकुम्भश्च कर्णाली ग्रासपट्टी तदा भवेत् ॥१२॥ कामदं कणपीठं च जाड्यकुम्भश्च कर्णिका । लतिने निर्गमं हीनं सान्धारे निर्गमाधिकम् ॥१३॥ गज आदि थरो वाली पीठ को गजपीठ कहते है। ऐसी रूपवाली पीठ बनाने में द्रव्य का अधिक खर्च होता है, इसलिये अपनी शक्ति के अनुसार अल्प द्रव्य से साधारण पीठ बनाने से भी बड़ा पुण्य होता है। गज अश्व आदि रूपोंवाली पीठ को छोड़कर जाड्यकुम्भ, कर्णिका और केवाल के साथ ग्रासपट्टी वाली साधारण पीठ बनावे, उसको कामदपीठ कहते है। तथा जाड्यकुम्भ और कर्णिका ये दो थरवाली पीठ बनावे, उसको कणपीठ कहते है। लतिनजाति के प्रासाद के पीठ का निर्गम कम होता है और सांधार जातिके प्रासाद के पीठ का निर्गम अधिक होता है ॥१२-१३॥ सर्वेषां पीठमाधारः पीठहीनं निराश्रयम् । पीठहीनं त्रिनाशाय प्रासादभुवनादिकम् ॥१४॥ इति पीठम् ।