प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्याय ४५ प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल बढ़ा करके पीठ का उदय रखना चाहिये। यह पीठ की ऊंचाई का मध्यम मान माना गया है। इसमें इसका पांचवां भाग बढ़ावे तो ज्येष्ठमान और घटावे तो कनिष्ठ मान होता है। ज्येष्ठ मान का पांचवां भाग ज्येष्ठ मे बढ़ावे तो ज्येष्ठ ज्येष्ठ, घटावे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ, मध्यम का पाचवा भाग मध्यम मे बढ़ावे तो ज्येष्ठ मध्यम घटावे तो कनिष्ठ मध्यम, कनिष्ठ मान का पाचवा भाग कनिष्ठ मे बढावे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ और घटावे तो कनिष्ठ कनिष्ठ, इस प्रकार पीठ के उदय का नव भेद होते है। इन नव भेदो के नाम बतलाते है— "शुभद सर्वतोभद्रं पद्मकं च वसुन्धरम् । सिंहपीठं तथा व्योम गरुडं हंसमेव च ॥ वृषभं यद्भवेत् पीठं मेरोराधारकारणम् । पीठमानमिति ख्यातं प्रासादे आदिसोमया ॥” सूत्र० १२३ शुभद, सर्वतोभद्र, पद्मक, वसुन्धर, सिंहपीठ, व्योम, गरुड, हंस और वृषभ ये नव नाम पीठोदय के है। इनमे वृषभपीठ मेरुप्रासाद का आधार रूप है । दि० वसुनंदीकृत प्रतिष्ठासार मे पीठ का मान— “प्रासादविस्तराद्धेन स्वोच्छ्रितं पीठमुत्तमम् । मध्यमं पादहीनं स्याद् उत्तमाद्धेन कन्यसम् ॥” प्रासाद के विस्तार के अर्द्ध मान का पीठ का उदय रक्खे । इसे उत्तम मान की पीठ माना है। इस उत्तम मान की पीठ के उदय का चार भाग करके उनमे से तीन भाग के मान का पीठ का उदय रक्खे तो मध्यम मान की और दो भाग के मान का पीठ का उदय रक्खे तो कनिष्ठ मान की पीठ माना है। पीठोदय का थरमान— त्रिपञ्चाशत् समुत्सेधे द्वाविंशत्यंशनिर्गमे ॥७॥ नवांशो जाडद्यकुम्भश्च सप्तांशा १कर्णिका २भवेत् । सान्तरालं कपोतालिः सप्तांशा ग्रासपट्टिका ॥८॥ सूर्यदिग्वसुभागैश्च गजवाजिनराः क्रमात् । वाजिस्थानेऽथवा कार्यं स्वस्वदेवस्य वाहनम् ॥६॥ पीठ का जो उदयमान आया हो, उसमें ५३ भाग करे। उनमे से बाईस भाग के मान का पीठ प्रासाद की महापीठ (१) सप्तांश । (२) कणिकं ।