भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

सपाददश हस्तश्च प्रासादे दशपञ्चके । विंशहस्तोदये कार्यः सार्द्धद्वादशहस्तकः ॥ पञ्चविंशोदये ज्ञेयः पादोनदशपञ्चकः । त्रिंशहस्ते महाप्राज्ञ ! सप्तदशोदयस्तथा ॥ सपादेकोनविंशतिः पञ्चत्रिंशे मुनीश्वर ! । व्योमवेदे यदा हस्ते सार्धः स्यादेकविंशतिः ॥ चतुविंशतिः पादोनः पञ्चचत्वारिंशद्धस्तके । शताद्धोदये मान तु हस्ताः स्युः पञ्चविंशतिः ॥'' प्रासाद का विस्तार एक हाथ हो तो ३३ अंगुल, दो हाथ हो तो ५५ अंगुल, तीन हाथ हो तो ७७ अगुल, चार हाथ हो तो ६७ अगुल, पांच हाथ का हो तो पाच हाथ, छह हाथ का हो तो पांच हाथ और २२ अगुल, सात हाथ का हो तो छह हाथ और १७ अगुल, आठ हाथका हो तो सात हाथ और आठ अंगुल, नव हाथ का हो तो सात हाथ और १६ अंगुल, दस हाथ का हो तो आठ हाथ, पंद्रह हाथ का हो तो दस हाथ और छह अंगुल, बीस हाथ का हो तो बारह हाथ और बारह अगुल, पचीस हाथ का हो तो चौदह हाथ और १८ अंगुल, तीस हाथ का हो तो सत्रह हाथ, पेतीस हाथ का हो तो १६ हाथ और छह अंगुल, चालीस हाथ का हो तो २१ हाथ और १२ अंगुल, पैतालीस हाथ का हो तो २३ हाथ १८ अंगुल, और पचास हाथ का हो तो २५ हाथ का उदय करना चाहिये । अर्थात् दश हाथ के बाद पाच पांच हाथ मे सवा दो २ हाथ उदय क ने का विधान है। प्रासाद के उदय से पीठका उदयमान— एकविंशत्यंशभक्ते प्रासादस्य समुच्छ्रये । पञ्चादिनवभागान्तं पीठस्य पञ्चधोदयः ॥१६॥ प्रासाद का खुरा से लेकर छज्जा तक जो उदयमान आवे, उसका इक्कीस भाग करके पाच, छह, सात, आठ अथवा नव भाग जितना पीठ का उदय रखे। इस तरह पाच प्रकार से पीठ का उदयमान होता है ॥१६॥ १४४ भाग के मंडोवर (दीवार) के थरों का उदयमान— वेदवेदेन्दुभक्ते तु छाद्यान्तं पीठमस्तकात् । खुरकः पञ्चभागः स्याद् विंशतिः कुम्भकस्तथा ॥२०॥ कलशोऽष्टौ द्विसाङ्घं तु कर्त्तव्यमन्तरालकम् । कपोतिकाष्टौ मञ्ची च कर्त्तव्या नवभागिका ॥२१॥ प्रा० ७