प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० प्रासादमण्डने पञ्चत्रिंशत्पदा¹ जङ्घा तिष्यंशैरूद्गमो भवेत् । वसुभिर्भरणी कार्या दिग्भागैश्च² शिरावटी ॥२२॥ अष्टांशोर्ध्वा कपोतालि-द्विसाद्धॆ मन्तरालकम् । छाद्यं त्रयोदशांशोच्चं दशभागैर्वनिर्गमः ॥२३॥ इति मण्डोवरः । पीठ के ऊपर से छज्जा के अंत भाग तक पूर्वोक्त प्रासाद के उदय का जो मान आया हो, उसका एक सौ चउआलीस (१४४) भाग करें। उनमें से पांच भाग का खुरा, बीस भाग का कुम्भा, आठ भाग का कलश, ढाई भाग का अंतराल, आठ भाग का केवल, नव भाग की मंची, पैंतीस भाग की जंघा, पंद्रह भाग का उद्गम (उरःजंघा), आठ भाग की भरणी, दस भाग की शिरावटी, आठ भाग की कपोतिका (केवल), ढाई भाग का अंतराल और तेरह भाग का छज्जा का उदय रक्खे और छज्जा का निर्गम दस भाग का रक्खे ॥२० से २४॥ इन १४४ भाग के मडोवर के थरों मे जो रूप किया जाता है, उसका वर्णन अपराजित पृच्छा सूत्र १२२ के अनुसार ज्ञानप्रकाश दीपार्णव के पांचवें अध्याय में लिखा है कि— "खुरकः पञ्चभागस्तु विंशतिः कुम्भकस्तथा । पूर्वमध्यपरे भागे ब्रह्मविष्णुमुद्रादयः ॥ त्रिसन्ध्या भद्रे शोभाढ्या चित्रपरिकरैर्वृताः । नासके रूपसंघाटा गर्भे च रथिकोत्तमा ॥ मृणालपत्रं शोभाढ्यं स्तम्भिका तोरणान्विता ।" पीठ के ऊपर खुरा पांच भाग और कुम्भा बीस भाग रक्खें । कुम्भा मे ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का स्वरूप बनावे, इन तीन देवो में से एक मध्य मे और उसके दोनों बगल में एक २ देव बनावे । भद्र के कुम्भा मे तीन संध्या देवी, अपने परिवार के साथ बनावें, कोणे के कुम्भा मे अनेक प्रकार के रूप बनावे, तथा भद्र के मध्यगर्भ मे सुन्दर रथिका (गवाक्ष) बनावे । कमल के पान के आकार और तोरण वाले स्तंभ बनावें । "कलशो वसुभागस्तु सार्धद्वौ चान्तःपत्रकम् ॥ वसुभिश्च कपोतालि-र्मञ्चिका नवभागिका । पञ्चत्रिंशदुच्छ्रिता च जङ्घा कार्या विचक्षण ! ॥ भ्रमनिर्वाणतः स्तम्भै-र्नासकोपाङ्गफालनाः । मूननासकसर्वेषु स्तम्भाः स्युश्चतुरस्रकाः ॥ गजैः सिंहैर्वरालैश्च मकरैः समलङ्कृताः ।" (१) 'त्रिंशत्त्र्ययुता' । (२) 'शिरावटी दशांशिका ।'