प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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| प्रश्न १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३ |
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| क्रियाविशेषणो द्वितीयस्तच्छब्दः, इष्टं च पूर्तं चेष्टापूर्ते इत्यादि कृतमेवोपासते नाकृतं नित्यं ते चान्द्रमसं चन्द्रमसि भवं प्रजापतेर्मिथुनात्मकस्यांशं रयिमन्नभूतं लोकमभिजयन्ते कृतरूपत्वाच्चान्द्रमसस्य । ते तत्रैव च कृतक्षयात्पुनरावर्तन्ते “इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति” (मु० उ० १।२।१०) इति ह्युक्तम् ।<br><br>यस्मादेवं प्रजापतिमन्नात्मकं फलत्वेनाभिनिर्वर्तयन्ति चन्द्रम् इष्टापूर्तकर्मणैत ऋषयः स्वर्गद्रष्टारः प्रजाकामाः प्रजार्थिनो गृहस्थास्तस्मात्स्वकृतमेव दक्षिणं दक्षिणायनोपलक्षितं चन्द्रं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिरन्नं यः पितृयाणः पितृयाणोपलक्षितः चन्द्रः ॥९॥ | निश्चयपूर्वक उस इष्ट और पूर्त यानी इष्टापूर्त्त इत्यादि कृतकी ही उपासना करते हैं—अकृतकी नहीं करते वे सर्वदा चान्द्रमस—चन्द्रमामें ही होनेवाले यानी मिथुनात्मक प्रजापतिके अंश रयि अर्थात् अन्नभूत लोकको ही जीतते हैं, क्योंकि चन्द्रलोक कृत (कर्म) रूप है । श्रुतिमें दूसरा 'तत्' शब्द क्रियाविशेषण है । वे वहाँ ही अपने कर्मका क्षय होनेपर फिर लौट आते हैं, जैसा कि “इस (मनुष्य) लोक अथवा इससे भी निकृष्ट (तिर्यगादि) लोकमें प्रवेश करते हैं” इस [मुण्डक श्रुति] में कहा है ।<br><br>क्योंकि ऐसा है इसलिये ये सन्तानार्थी ऋषि—स्वर्गद्रष्टा गृहस्थ-लोग इष्ट और पूर्त कर्मोद्वारा उनके फलरूपसे अन्नात्मक प्रजापति यानी चन्द्रलोकका ही निर्माण करते हैं; अतः वे अपने रचे हुए दक्षिण यानी दक्षिणायनमार्गसे उपलक्षित चन्द्रलोकको ही प्राप्त होते हैं । यह जो पितृयाण अर्थात् पितृयाणसे उपलक्षित चन्द्रलोक है वह निश्चय रयि—अन्न ही है ॥९॥ |