प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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| १४ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न १ |
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अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मान-
मन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतद-
मृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोध-
स्तदेष श्लोकः ॥ १० ॥
तथा तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्याद्वारा आत्माकी शोध करते हुए वे उत्तरमार्गद्वारा सूर्यलोकको प्राप्त होते हैं। यही प्राणोंका आश्रय है, यही अमृत है, यही अभय है और यही परा गति है । इससे फिर नहीं लौटते; अतः यही निरोधस्थान है । इस विषयमें यह [ अगला ] मन्त्र है—॥ १० ॥
| अथोत्तरेणायनेन प्रजापतेः अंशं प्राणमत्तारमादित्यमभिजयन्ते; केन ? तपसेन्द्रियजयेन विशेषतो ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया च प्रजापत्यात्मविषयया आत्मानं प्राणं सूर्यं जगतस्तस्थुषश्चान्विष्याहमस्मीति विदित्वादित्यमभिजयन्तेऽभिप्राप्नुवन्ति । <br><br> एतद्धा आयतनं सर्वप्राणानां सामान्यमायतनमाश्रयमेतदमृतम् अविनाशि । अभयमत एव भयवर्जितं न चन्द्रवत्क्षयवृद्धिमय- | तथा उत्तरायणसे वे प्रजापतिके अंश भोक्ता प्राणको यानी आदित्यको प्राप्त होते हैं । किस साधनसे प्राप्त होते हैं ? तप अर्थात् इन्द्रियजयसे; विशेषतः ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और प्रजापतितादात्म्यविषयक विद्यासे अर्थात् अपनेको स्थावर-जङ्गम जगत्के प्राण सूर्यरूपसे अनुसंधानकर यानी यह समझकर कि यह [ सूर्य ] ही मैं हूँ आदित्यलोकपर विजय पाते अर्थात् उसे प्राप्त होते हैं । <br><br> निश्चय यही आयतन—सम्पूर्ण प्राणोंका सामान्य आयतन यानी आश्रय है । यही अमृत—अविनाशी है, अतः यह अभय—भयरहित है, चन्द्रमाके समान क्षय-वृद्धिरूप भययुक्त नहीं है तथा यही |