प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
| वत् । एतत्परायणं परा गतिः विद्यावतां कर्मिणां च ज्ञानवताम् । एतस्मान्न पुनरावर्तन्ते यथेतरे केवलकर्मिण इति । यस्मादेषोऽविदुषां निरोधः । आदित्याद्धि निरुद्धा अविद्वांसो नैते संवत्सरमादित्यमात्मानं प्राणमभिप्राप्नुवन्ति । स हि संवत्सरः कालात्माविदुषां निरोधः । तत्तत्रास्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रः ॥ १० ॥ | उपासकोंकी और उपासनासहित कर्मानुष्ठान करनेवालोंकी परा गति है। इस पदको प्राप्त होकर अन्य केवल कर्मपरायणोंके समान फिर नहीं लौटते, क्योंकि यह अविद्वानोंके लिये निरोध है, क्योंकि उपासनाहीन पुरुष आदित्यसे रुके हुए हैं;* ये लोग आदित्यरूप संवत्सर यानी अपने आत्मा प्राणको प्राप्त नहीं होते। वह कालरूप संवत्सर ही अविद्वानोंका निरोधस्थान है। तहाँ इस विषयमें यह श्लोक यानी मन्त्र प्रसिद्ध है १० |
आदित्यका सर्वाधिष्ठानत्व
पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥
अन्य कालवेत्तागण इस आदित्यको पाँच पैरोंवाला, सबका पिता, बारह आकृतियोंवाला, पुरीषी (जलवाला) और द्युलोकके परार्द्धमें स्थित बतलाते हैं तथा ये अन्य लोग उसे सर्वज्ञ और उस सात चक्र और छः अरेवालेमें ही इस जगत्को अर्पित बतलाते हैं ॥ ११ ॥
| पञ्चपादं पञ्चर्तवः पादा इवास्य संवत्सरात्मन आदित्यस्य तैरसौ पादैरिवर्तुभिरावर्तते । | पाँच ऋतुएँ इस संवत्सररूप आदित्यके मानो चरण हैं; इसलिये यह पञ्चपाद है, क्योंकि उन ऋतुओंसे यह चरणोंके समान |
* अर्थात् वे आदित्यमण्डलको वेधकर नहीं जा सकते।