भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९


वा स्वात्मनो विच्छिद्यापनयन्ति; के ? ये दिवाऽहनि रत्या रति-कारणभूतया सह स्त्रिया संयुज्यन्ते मिथुनं मैथुनमाचरन्ति मूढाः। यत एवं तस्मात्तन्न कर्तव्यमिति प्रतिषेधः प्रासङ्गिकः। यद्रात्रौ संयुज्यन्ते रत्या ऋतौ ब्रह्मचर्यमेव तदिति प्रशस्तत्वादृतौ भार्यागमनं कर्तव्यमित्ययमपि प्रासङ्गिको विधिः। प्रकृतं तूच्यते—सोऽहोरात्रात्मकः प्रजापतिर्व्रीहियवाद्यन्नात्मना व्यवस्थितः ॥ १३ ॥नष्ट करते हैं । कौन ? जो कि मूढ होकर दिनके समय रति—रतिकी कारणस्वरूपा स्त्रीसे संयुक्त होते हैं, अर्थात् मिथुन यानी मैथुन करते हैं । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये ऐसा नहीं करना चाहिये—यह प्रासङ्गिक प्रतिषेध प्राप्त होता है । तथा ऋतुकालमें जो रात्रिके समय रतिसे संयुक्त होते हैं वह तो ब्रह्मचर्य ही है; अतः प्रशस्त होनेके कारण ऋतु रात्रिमें स्त्री-गमन करना चाहिये—यह भी प्रासङ्गिक विधि ही है, अब प्रकृत विषय [ अगले मन्त्रसे ] कहा जाता है । वह अहोरात्रात्मक प्रजापति [ इस प्रकार क्रमशः परिणामको प्राप्त होकर ] व्रीहि और यव आदि अन्नरूपसे स्थित हुआ है ॥ १३ ॥

एवं क्रमेण परिणम्य तत्इस प्रकार क्रमशः परिणामको प्राप्त होकर वह

अन्नका प्रजापतित्व

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥१४॥

अन्न ही प्रजापति है; उसीसे वह वीर्य होता है और उस वीर्य-हीसे यह सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है ॥ १४ ॥

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