भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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३२प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न २:

| अथवा प्राण ते तवेमाः प्रजाः स्वात्मभूतास्त्वदन्नसंवर्धितास्त्वदभिवर्षणदर्शनमात्रेण चानन्दरूपाः सुखं प्राप्ता इव सत्यः तिष्ठन्ति कामायेच्छातोऽन्नं भविष्यतीत्येवमभिप्रायः ॥१०॥ | भावार्थ है। अथवा [ यों समझो कि ] हे प्राण ! 'ते'—तेरी स्वात्मभूत यह सम्पूर्ण प्रजा तेरे [ दिये हुए ] अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होकर तेरी वृष्टिके दर्शनमात्रसे आनन्दरूपा-अर्थात् सुखको प्राप्त हुईके समान स्थित होती है । उसके आनन्दरूप होनेमें यह अभिप्राय है कि [ उस वृष्टिसे उसे ऐसी आशा हो जाती है कि ] 'अत्र यथेच्छ अन्न उत्पन्न होगा' ॥ १० ॥ |

किं च—इसके सिवां—

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥११॥

हे प्राण ! तू व्रात्य (संस्कारहीन), एकर्षि नामक अग्नि, भोक्ता और विश्वका सत्पति है, हम तेरा भक्ष्य देनेवाले हैं । हे वायो ! तू हमारा पिता है ॥ ११ ॥

प्रथमजत्वादन्यस्य संस्कर्तुरभावादसंस्कृतो व्रात्यस्त्वं स्वभावत एव शुद्ध इत्यभिप्रायः । हे प्राणैकर्षिस्त्वमाथर्वणानां प्रसिद्ध एकर्षिनामाग्निः सन्नत्ता सर्वहविषाम् । त्वमेव विश्वस्य सर्वस्यहे प्राण ! सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला होनेसे किसी अन्य संस्कारकर्ताका अभाव होनेके कारण तू व्रात्य (संस्कारहीन) है, तात्पर्य यह है कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है। तू आथर्वणोंका एकर्षि यानी एकर्षिनामक प्रसिद्ध अग्नि होकर सम्पूर्ण हवियोंका भोक्ता है । तथा
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