भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 131 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३


सतो विद्यमानस्य पतिः सत्पतिः।तू ही समस्त विद्यमान जगत्का पति है इसलिये, अथवा [ सत्का ] साधु पति होनेके कारण तू सत्पति है ।
साधुर्वा पतिः सत्पतिः ।
वयं पुनराद्यस्य तवादनीयस्य हविषो दातारः । त्वं पिता मातरिश्व हे मातरिश्वन्नोऽस्माकम् । अथ वा मातरिश्वनो वायोस्त्वम् । अतश्च सर्वस्यैव जगतः पितृत्वं सिद्धम् ॥ ११ ॥हम तो तेरे आद्य—भक्ष्य हविके देनेवाले हैं । हे मातरिश्वन् ! तू हमारा पिता है । अथवा [ यों समझो कि ] तू 'मातरिश्वनः'—वायुका पिता है । अतः तुझमें सम्पूर्ण जगत्का पितृत्व सिद्ध होता है ॥ ११ ॥

किं बहुना— । अधिक क्या—

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ।
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥

तेरा जो स्वरूप वाणीमें स्थित है तथा जो श्रोत्र, नेत्र और मनमें व्याप्त है उसे तू शान्त कर । तू उत्क्रमण न कर ॥ १२ ॥

या ते त्वदीया तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता वक्तृत्वेन वदनचेष्टां कुर्वती, या श्रोत्रे या च चक्षुषि या च मनसि संकल्पादिव्यापारेण सन्तता समनुगता तनूस्तां शिवां शान्तां कुरु मोत्क्रमीरुत्क्रमणेन अशिवां मा कार्षीरित्यर्थः ॥१२॥तेरा जो स्वरूप वक्तारूपसे बोलनेकी चेष्टा करता हुआ वाणीमें स्थित है तथा जो श्रोत्र, नेत्र और सङ्कल्पादि व्यापारसे मनमें व्याप्त है उसे शिव—शान्त कर । उत्क्रमण न कर, अर्थात् उत्क्रमण करके उसे अशिव—अमङ्गलमय न कर ॥ १२ ॥

किं बहुना । बहुत क्या—