प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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३६ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ३
| आयात्यस्मिञ्शरीरे। किंनिमित्तकमस्य शरीरग्रहणमित्यर्थः । प्रविश्य शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य प्रविभागं कृत्वा कथं केन प्रकारेण प्रातिष्ठते प्रतितिष्ठति । केन वा वृत्तिविशेषेणास्माच्छरीरादुत्क्रमत उत्क्रामति । कथं बाह्यमधिभूतमधिदैवतं चाभिधत्ते धारयति कथमध्यात्मम् इति, धारयतीति शेषः ॥ १ ॥ | उत्पन्न होता है ? तथा उत्पन्न होनेपर किस वृत्तिविशेषसे इस शरीरमें आता है ? अर्थात् इसका शरीरग्रहण किस कारणसे होता है ? और शरीरमें प्रविष्ट होकर अपनेको विभक्त कर—अपने अनेकों विभाग कर किस प्रकार उसमें स्थित होता है ? फिर किस वृत्तिविशेषसे इस शरीरसे उत्क्रमण करता है ? और किस प्रकार बाह्य यानी अधिभूत और अधिदैव विषयोंको धारण करता है ? तथा किस प्रकार अध्यात्म (देहेन्द्रियादि) को [धारण करता है ?] 'धारण करता है' यह वाक्य शेष है ॥१॥ |
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| एवं पृष्टः— | [कौसल्यद्वारा ] इस प्रकार पूछे जानेपर— |
पिप्पलाद मुनिका उत्तर
तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥
उससे पिप्पलाद आचार्यने कहा—'तू बड़े कठिन प्रश्न पूछता है। परन्तु तू [बड़ा] ब्रह्मवेत्ता है; अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ' ॥२॥