प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३७
| तस्मै स होवाचाचार्यः, प्राण एव तावद्दुर्विज्ञेयत्वाद्द्विषमप्रश्नाहँस्तस्यापि जन्मादि त्वं पृच्छस्यतोऽतिप्रश्नान्पृच्छसि । ब्रह्मिष्ठोऽसीत्यतिशयेन त्वं ब्रह्मविदतस्तुष्टोऽहं तस्मात्ते तुभ्यं ब्रवीमि यत्पृष्टं शृणु ॥ २ ॥ | उससे उस आचार्यने कहा— 'प्रथम तो प्राण ही दुर्विज्ञेय होनेके कारण विषम प्रश्नका विषय है; तिसपर भी तू तो उसके भी जन्मादि पूछता है । अतः तू बड़े ही कड़े प्रश्न पूछ रहा है । परन्तु तू ब्रह्मिष्ठ—अत्यन्त ब्रह्मवेत्ता है, अतः मैं तुझसे प्रसन्न हूँ; सो तूने जो कुछ पूछा है वह तुझसे कहता हूँ, सुन ॥ २ ॥ |
प्राणकी उत्पत्ति
आत्मन एष प्राणो जायते। यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥
यह प्राण आत्मासे उत्पन्न होता है । जिस प्रकार मनुष्य-शरीरसे यह छाया उत्पन्न होती है उसी प्रकार इस आत्मामें प्राण व्याप्त है तथा यह मनोकृत सङ्कल्पादिसे इस शरीरमें आ जाता है ॥ ३ ॥
| आत्मनः परस्मात्पुरुषादक्षरात्सत्यादेष उक्तः प्राणो जायते। कथमित्यत्र दृष्टान्तः । यथा लोक एषा पुरुषे शिरःपाण्यादिलक्षणे निमित्ते छाया नैमित्तिकी जायते तद्वदेतस्मिन्ब्रह्मण्येतत् प्राणाख्यं छायास्थानीयमनृतरूपं तत्त्वं सत्ये पुरुष आततं समर्पितम् | यह उपर्युक्त प्राण आत्मा— परम पुरुष—अक्षर यानी सत्यसे उत्पन्न होता है । किस प्रकार उत्पन्न होता है ? इसमें यह दृष्टान्त देते हैं—जिस प्रकार लोकमें शिर तथा हाथ-पाँववाले पुरुषरूप निमित्तके रहते हुए ही उससे होनेवाली छाया उत्पन्न होती है उसी प्रकार इस ब्रह्म यानी सत्य पुरुषमें यह छायास्थानीय मिथ्या तत्त्व |