प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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| ३८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
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| इत्येतत् । छायेव देहे मनोकृतेन मनःसंकल्पेच्छादिनिष्पन्नकर्मनिमित्तेनेत्येतत्—वक्ष्यति हि “पुण्येन पुण्यम्” (प्र० उ० ३।७) इत्यादि; तदेव “सक्तः सह कर्मणा” (बृ० उ० ४।४।६) इति च श्रुत्यन्तरात्—आयाति आगच्छत्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥ | व्याप्त—समर्पित है । देहमें छायाके समान यह मनके कार्यसे यानी मनके सङ्कल्प और इच्छादिसे होनेवाले कर्मसे इस शरीरमें आता है । जैसा कि आगे “पुण्यसे पुण्यलोकको ले जाता है” आदिश्रुतिसे कहेंगे । “कर्मफलमें आसक्त हुआ पुरुष अपने कर्मके सहित [उसीको प्राप्त होता है ]” इस अन्य श्रुतिसे भी यही बात कही गयी है ॥ ३ ॥ |
प्राणका इन्द्रियाधिष्ठातृत्व
यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते । एतान्ग्रामान्ने-
तान्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान्प्राणान्पृथक्पृथ-
गेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥
जिस प्रकार सम्राट् ही 'तुम इन-इन ग्रामोंमें रहो' इस प्रकार अधिकारियोंको नियुक्त करता है उसी प्रकार यह मुख्य प्राण ही अन्य प्राणों (इन्द्रियों) को अलग-अलग नियुक्त करता है ॥ ४ ॥
| यथा येन प्रकारेण लोके राजा सम्राडेव ग्रामादिष्वधिकृतान्विनियुङ्क्ते । कथम् ? एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्व इति । एवमेव यथा दृष्टान्तः एष मुख्यः प्राण इतरान्प्राणान् | जिस प्रकार लोकमें राजा ही ग्रामादिमें अधिकारियोंको नियुक्त करता है; किस प्रकार [नियुक्त करता है ? कि] तुम इन-इन ग्रामोंमें अधिष्ठान (निवास) करो । इस प्रकार, जैसा यह दृष्टान्त है वैसे ही, यह मुख्य प्राण भी अपने भेदस्वरूप |