प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
| चक्षुरादीनात्मभेदांश्च पृथक् पृथगेव यथास्थानं संनिधत्ते विनियुङ्क्ते ॥ ४ ॥ | चक्षु आदि अन्य प्राणोंको अलग-अलग उनके स्थानोंके अनुसार स्थापित करता यानी नियुक्त करता है ॥ ४ ॥ |
तत्र विभागः— | उनका विभाग इस प्रकार है—
पञ्च प्राणोंकी स्थिति
पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्ताचि॑षो भवन्ति ॥ ५ ॥
वह [प्राण] पायु और उपस्थमें अपानको [नियुक्त करता है] और मुख तथा नासिकासे निकलता हुआ नेत्र एवं श्रोत्रमें स्वयं स्थित होता है तथा मध्यमें समान रहता है । यह [समानवायु] ही खाये हुए अन्नको समभावसे [शरीरमें सर्वत्र] ले जाता है । उस [प्राणाग्नि] से ही [दो नेत्र, दो कर्ण, दो नासारन्ध्र और एक रसना] ये सात ज्वालाएँ उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥
| पायूपस्थे पायुश्चोपस्थश्च पायूपस्थं तस्मिन्, अपानमात्मभेदं मूत्रपुरीषाद्यपनयनं कुर्वंस्तिष्ठति संनिधत्ते । तथा चक्षुःश्रोत्रे चक्षुश्च श्रोत्रं च चक्षुःश्रोत्रं तस्मिंश्चक्षुःश्रोत्रे, मुखनासिकाभ्यां च मुखं च नासिका च ताभ्यां मुखनासिकाभ्यां च निर्गच्छन्प्राणः स्वयं सम्राट्स्थानीयः प्रातिष्ठते प्रतितिष्ठति । | यह प्राण अपने भेद अपानको पायूपस्थमें—पायु (गुदा) और उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय) में मूत्र और पुरीष (मल) आदिको निकालते हुए स्थित करता यानी नियुक्त करता है । तथा मुख और नासिका इन दोनोंसे निकलता हुआ सम्राट्स्थानीय प्राण चक्षुःश्रोत्रे—चक्षु और श्रोत्रमें स्थित रहता है । तथा |