भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 131 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50
४०प्रश्नोपनिषद्[प्रश्न ३

| मध्ये तु प्राणापानयोः स्थानयोर्नाभ्यां समानोऽशितं पीतं च समं नयतीति समानः। | प्राण और अपानके स्थानोंके मध्य नाभिदेशमें समान रहता है, जो खाये और पिये हुए पदार्थको सम करनेके कारण समान कहलाता है। | | एष हि यस्माद्यदेतद्द्भुतं भुक्तं पीतं चात्माग्नौ प्रक्षिप्तमन्नं समं नयति तस्मादशितपीतेन्धनाद् अग्नेरौदर्याद्धृदयदेशं प्राप्तादेताः सप्तसंख्याका अर्चिषो दीप्तयो निर्गच्छन्त्यो भवन्ति शीर्षण्याः। घ्राणद्वारा दर्शनश्रवणादिलक्षणरूपादिविषयप्रकाशा इत्यभिप्रायः ॥ ५॥ | क्योंकि यह समानवायु ही खायी-पीयी वस्तुको अर्थात् देहान्तर्वर्ती जठरानलमें डाले हुए अन्नको समभावसे [समस्त शरीरमें] पहुँचाता है इसलिये खान-पानरूप ईंधनसे हृदयदेशमें प्राप्त हुए इस जठराग्निसे ये शिरोदेशवर्तिनी सात अर्चियाँ-दीप्तियाँ निकली हैं। तात्पर्य यह है कि रूपादि विषयोंके दर्शन-श्रवण आदिरूप प्रकाश प्राणसे ही निष्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥ |


लिङ्गदेहकी स्थिति

हृदि ह्येष आत्मा । अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति ॥ ६ ॥

यह आत्मा हृदयमें है। इस हृदयदेशमें एक सौ एक नाडियाँ हैं। उनमेंसे एक-एककी सौ शाखाएँ हैं और उनमेंसे प्रत्येककी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा नाडियाँ हैं। इन सबमें व्यान सञ्चार करता है ॥६॥