प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| प्रश्न ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४१ |
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| हृदि ह्येष पुण्डरीकाकारमांस-<br>पिण्डपरिच्छिन्ने हृदयाकाश एष<br>आत्मात्मना संयुक्तो लिङ्गात्मा ।<br>अत्रास्मिन्हृदय एतदेकशतम्<br>एकोत्तरशतं संख्यया प्रधान-<br>नाडीनां भवतीति । तासां शतं<br>शतमेकैकस्याः प्रधाननाड्या<br>भेदाः । पुनरपि द्वासप्ततिर्द्वा-<br>सप्ततिद्वे सहस्रे अधिके<br>सप्ततिश्च सहस्राणि सहस्राणां<br>द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडी-<br>सहस्राणि । प्रतिप्रतिनाडीशतं<br>संख्यया प्रधाननाडीनां सह-<br>स्राणि भवन्ति । | यह आत्मा—आत्मासहित लिङ्ग-<br>देह अर्थात् जीवात्मा हृदयमें यानी<br>कमलके-से आकारवाले मांसपिण्डसे<br>परिच्छिन्न हृदयाकाशमें रहता है ।<br>इस हृदयदेशमें ये एक शत यानी<br>एक ऊपर सौ (एक सौ एक)<br>प्रधान नाड़ियाँ हैं । उनमेंसे प्रत्येक<br>प्रधान नाडीके सौ-सौ भेद हैं और<br>प्रधान नाडीके उन सौ-सौ भेदोंमेंसे<br>प्रत्येकमें बहत्तर-बहत्तर सहस्र अर्थात्<br>दो ऊपर सत्तर सहस्र' प्रतिशाखा<br>नाड़ियाँ हैं । |
| आसु नाडीषु व्यानो वायुः<br>चरति व्यानो व्यापनात् ।<br>आदित्यादिव रश्मयो हृदयात्<br>सर्वतोगामिनीभिर्नाडीभिः सर्व-<br>देहं संव्याप्य व्यानो वर्तते ।<br>सन्धिस्कन्धमर्मदेशेषु विशेषेण<br>प्राणापानवृत्त्योश्च मध्य उद्भूत-<br>वृत्तिर्वीर्यवत्कर्मकर्ता भवति ॥६॥ | इन सब नाडियोंमें व्यानवायु<br>सञ्चार करता है । व्यापक होनेके<br>कारण उसे 'व्यान' कहते हैं ।<br>जिस प्रकार सूर्यसे किरणें निकलती<br>हैं उसी प्रकार हृदयसे निकलकर<br>सब ओर फैली हुई नाडियोंद्वारा<br>व्यान सम्पूर्ण देहको व्याप्त करके<br>स्थित है । सन्धिस्थान, स्कन्धदेश<br>और मर्मस्थलोंमें तथा विशेषतया<br>प्राण और अपानवायुकी वृत्तियोंके<br>मध्यमें इस (व्यानवायु)की अभिव्यक्ति<br>होती है और यही पराक्रमयुक्त<br>कर्मोंका करनेवाला है ॥ ६ ॥ |