प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| ४२ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
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प्राणोत्क्रमणका प्रकार
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन
पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥
तथा [ इन सब नाडियोंमेंसे सुषुम्ना नामकी ] एक नाड़ीद्वारा ऊपरकी ओर गमन करनेवाला उदानवायु [ जीवको ] पुण्य-कर्मके द्वारा पुण्यलोकको और पापकर्मके द्वारा पापमय लोकको ले जाता है तथा पुण्य-पाप दोनों प्रकारके ( मिश्रित ) कर्मोंद्वारा उसे मनुष्यलोकको प्राप्त कराता है ॥ ७ ॥
| अथ या तु तत्रैकशतानां नाडीनां मध्य ऊर्ध्वगा सुषुम्नाख्या नाडी तयैकयोर्ध्वः सन्नुदानो वायुरापादतलमस्तकवृत्तिः सञ्चरन्पुण्येन कर्मणा शास्त्रविहितेन पुण्यं लोकं देवादिस्थानलक्षणं नयति प्रापयति पापेन तद्विपरीतेन पापं नरकं तिर्यग्योन्यादिलक्षणम्। उभाभ्यां समप्रधानाभ्यां पुण्यपापाभ्यामेव मनुष्यलोकं नयतीत्यनुवर्तते ॥७॥ | तथा उन एक सौ एक नाड़ियोंमेंसे जो सुषुम्नानाम्नी एक ऊर्ध्वगामिनी नाड़ी है उस एकके द्वारा ही ऊपरकी ओर जानेवाला तथा चरणसे मस्तकपर्यन्त सञ्चार करनेवाला उदानवायु [जीवात्माको] पुण्य कर्म यानी शास्त्रोक्त कर्मसे देवादि-स्थानरूप पुण्यलोकको प्राप्त करा देता है तथा उससे विपरीत पापकर्मद्वारा पापलोक यानी तिर्यग्योनि आदि नरकों में ले जाता है और समानरूपसे प्रधान हुए पुण्य-पापरूप दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा वह उसे मनुष्यलोकको प्राप्त कराता है। यहाँ 'नयति' इस क्रियाकी सर्वत्र अनुवृत्ति होती है ॥ ७ ॥ |