भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४३


बाह्य प्राणादिका निरूपण

आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥

निश्चय आदित्य ही बाह्य प्राण है। यह इस चाक्षुष (नेत्रेन्द्रिय-स्थित) प्राणपर अनुग्रह करता हुआ उदित होता है। पृथिवीमें जो देवता है वह पुरुषके अपानवायुको आकर्षण किये हुए है। इन दोनोंके मध्यमें जो आकाश है वह समान है और वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
आदित्यो ह वै प्रसिद्धो ह्यधिदैवतं बाह्यः प्राणः स एष उद्यत्युद्गच्छति । एष ह्येनम् आध्यात्मिकं चक्षुषि भवं चाक्षुषं प्राणं प्रकाशेनानुगृह्णानो रूपोपलब्धौ चक्षुष आलोकं कुर्वन्नित्यर्थः। तथा पृथिव्यामभिमानिनी या देवता प्रसिद्धा सैषा पुरुषस्य अपानमपानवृत्तिमवष्टभ्याकृष्य वशीकृत्याध एवापकर्षणेनानुग्रहं कुर्वती वर्तत इत्यर्थः । अन्यथा हि शरीरं गुरुत्वात्पतेत्सावकाशे वोद्गच्छेत् ।यह प्रसिद्ध आदित्य ही अधिदैवत बाह्य प्राण है, वही यह उदित होता है—ऊपरकी ओर जाता है और यही इस आध्यात्मिक चाक्षुष (नेत्रस्थित) प्राणको—चक्षुमें जो हो उसे चाक्षुष कहते हैं—प्रकाशसे अनुगृहीत करता हुआ अर्थात् रूपकी उपलब्धिमें नेत्रको प्रकाश देता हुआ [उदित होता है]। तथा पृथिवीमें जो उसका प्रसिद्ध अभिमानी देवता है वह पुरुषके अपान अर्थात् अपानवृत्तिका अवष्टम्भ—आकर्षण करके यानी उसे अपने अधीन कर [स्थित रहता है]। तात्पर्य यह है कि नीचेकी ओर आकर्षणद्वारा उसपर अनुग्रह करता हुआ स्थित रहता है। नहीं तो, शरीर अपने भारीपनके कारण गिर जाता अथवा अवकाश मिलनेके कारण उड़ जाता।