प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४३
बाह्य प्राणादिका निरूपण
आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥
निश्चय आदित्य ही बाह्य प्राण है। यह इस चाक्षुष (नेत्रेन्द्रिय-स्थित) प्राणपर अनुग्रह करता हुआ उदित होता है। पृथिवीमें जो देवता है वह पुरुषके अपानवायुको आकर्षण किये हुए है। इन दोनोंके मध्यमें जो आकाश है वह समान है और वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| आदित्यो ह वै प्रसिद्धो ह्यधिदैवतं बाह्यः प्राणः स एष उद्यत्युद्गच्छति । एष ह्येनम् आध्यात्मिकं चक्षुषि भवं चाक्षुषं प्राणं प्रकाशेनानुगृह्णानो रूपोपलब्धौ चक्षुष आलोकं कुर्वन्नित्यर्थः। तथा पृथिव्यामभिमानिनी या देवता प्रसिद्धा सैषा पुरुषस्य अपानमपानवृत्तिमवष्टभ्याकृष्य वशीकृत्याध एवापकर्षणेनानुग्रहं कुर्वती वर्तत इत्यर्थः । अन्यथा हि शरीरं गुरुत्वात्पतेत्सावकाशे वोद्गच्छेत् । | यह प्रसिद्ध आदित्य ही अधिदैवत बाह्य प्राण है, वही यह उदित होता है—ऊपरकी ओर जाता है और यही इस आध्यात्मिक चाक्षुष (नेत्रस्थित) प्राणको—चक्षुमें जो हो उसे चाक्षुष कहते हैं—प्रकाशसे अनुगृहीत करता हुआ अर्थात् रूपकी उपलब्धिमें नेत्रको प्रकाश देता हुआ [उदित होता है]। तथा पृथिवीमें जो उसका प्रसिद्ध अभिमानी देवता है वह पुरुषके अपान अर्थात् अपानवृत्तिका अवष्टम्भ—आकर्षण करके यानी उसे अपने अधीन कर [स्थित रहता है]। तात्पर्य यह है कि नीचेकी ओर आकर्षणद्वारा उसपर अनुग्रह करता हुआ स्थित रहता है। नहीं तो, शरीर अपने भारीपनके कारण गिर जाता अथवा अवकाश मिलनेके कारण उड़ जाता। |
| ४४ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
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| यदेतदन्तरा मध्ये द्यावा-पृथिव्योर्य आकाशस्तत्स्थो वायुः आकाश उच्यते; मञ्चस्थवत् । स समानः समानमनुगृह्णानो वर्तत इत्यर्थः । समानस्यान्तराकाशस्थत्वसामान्यात् । सामान्येन च यो बाह्यो वायुः स व्याप्तिसामान्याद्व्यानो व्यानम् अनुगृह्णानो वर्तत इत्यभिप्रायः ॥८॥ | इन द्युलोक और पृथिवीके अन्तरा—मध्यमें जो आकाश है उसमें रहनेवाला वायु भी [लक्षणा-वृत्तिसे 'मञ्च' कहे जानेवाले] मञ्चस्थ व्यक्तियोंके समान आकाश कहलाता है। वही 'समान' है, अर्थात् समानवायुको अनुगृहीत करता हुआ स्थित है, क्योंकि मध्य-आकाशमें स्थित होना—यह समानवायुके लिये भी [बाह्य वायुकी तरह] साधारण है* । तथा साधारणतया जो बाह्य वायु है वह व्यापकत्वमें [शरीरके भीतर व्याप्त हुए व्यान-वायुसे] समानता होनेके कारण व्यान है अर्थात् व्यानपर अनुग्रह करता हुआ वर्तमान है ॥ ८ ॥ |
तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥
लोकप्रसिद्ध [ आदित्यरूप ] तेज ही उदान है। अतः जिसका तेज (शारीरिक ऊष्मा) शान्त हो जाता है वह मनमें लीन हुई इन्द्रियोंके सहित पुनर्जन्मको [अथवा पुनर्जन्मके हेतुभूत मृत्युको] प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
* समानवायु शरीरान्तर्वर्ती आकाशके मध्यमें रहता है और बाह्य वायु द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यवर्ती आकाशके बीच रहता है; इस प्रकार मध्य आकाशमें स्थित होना—यह दोनोंके लिये एक-सी बात है।
प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५
| यद्वाह्यं ह वै प्रसिद्धं सामान्यं तेजस्तच्छरीर उदान उदानं वायुमनुगृह्णाति स्वेन प्रकाशेनेत्यभिप्रायः । यस्मात्तेजःस्वभावो वाह्यतेजोऽनुगृहीत उत्क्रान्तिकर्ता तस्माद्यदा लौकिकः पुरुष उपशान्ततेजा भवति; उपशान्तं स्वाभाविकं तेजो यस्य सः, तदा तं क्षीणायुषं मुमूर्षु विद्यात् । स पुनर्भवं शरीरान्तरं प्रतिपद्यते । कथम् ? सहेन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः प्रविशद्भिर्वागादिभिः ॥ ९ ॥ | जो [ आदित्यसंज्ञक ] प्रसिद्ध बाह्य सामान्य तेज है वही शरीरमें उदान है; तात्पर्य यह है कि वहीं अपने प्रकाशसे उदान वायुको अनुगृहीत करता है । क्योंकि उत्क्रमण करनेवाला [ उदान-वायु ] तेजःस्वरूप है—बाह्य तेजसे अनुगृहीत होनेवाला है इसलिये जिस समय लौकिक पुरुष उपशान्ततेजा होता है अर्थात् जिसका स्वाभाविक तेज शान्त हो गया है ऐसा होता है उस समय उसे क्षीणायु—मरणासन्न समझना चाहिये । वह पुनर्भव यानी देहान्तरको प्राप्त होता है । किस प्रकार प्राप्त होता है ? [ इसपर कहते हैं— ] मनमें लीन—प्रविष्ट होती हुई वागादि इन्द्रियोंके सहित [ वह देहान्तरको प्राप्त होता है ] ॥ ९ ॥ |
मरणकालीन संकल्पका फल
| मरणकाले— | मरणकालमें— |
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यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः
सहात्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥
इसका जैसा चित्त (संकल्प) होता है उसके सहित यह प्राणको प्राप्त होता है । तथा प्राण तेजसे ( उदानवृत्तिसे ) संयुक्त हो [ उस भोक्ताको ] आत्माके सहित संकल्प किये हुए लोकको ले जाता है ॥ १० ॥
| ४६ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
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| यच्चित्तो भवति तेनैव चित्तेन संकल्पेनेन्द्रियैः सह प्राणं मुख्यप्राणवृत्तियायाति । मरणकाले क्षीणेन्द्रियवृत्तिः सन्मुख्यया प्राणवृत्त्यैवावतिष्ठत इत्यर्थः । तदाभिवदन्ति ज्ञातय उच्छ्वसिति जीवतीति ।<br><br>स च प्राणस्तेजसोदानवृत्त्या युक्तः सन्सहात्मना स्वामिना भोक्त्रा स एवमुदानवृत्त्यैव युक्तः प्राणस्तं भोक्तारं पुण्यपापकर्मवशाद्यथासंकल्पितं यथाभिप्रेतं लोकं नयति प्रापयति ॥ १० ॥ | इसका जैसा चित्त होता है उस चित्त—संकल्पके सहित ही यह जीव इन्द्रियोंके सहित प्राण अर्थात् मुख्य प्राणवृत्तिको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि मरणकालमें यह प्रक्षीण इन्द्रियवृत्तिवाला होकर मुख्य प्राणवृत्तिसे ही स्थित होता है। उसी समय जातिवाले कहा करते हैं कि 'अभी श्वास लेता है—अभी जीवित है' इत्यादि ।<br><br>वह प्राण ही तेज अर्थात् उदान वृत्तिसे सम्पन्न हो आत्मा—भोक्ता स्वामीके साथ [सम्मिलित होता है]। तथा उदानवृत्तिसे संयुक्त हुआ वह प्राण ही उस भोक्ता जीवको उसके पाप-पुण्यमय कर्मोंके अनुसार यथासङ्कल्पित अर्थात् उसके अभिप्रायानुसारी लोकोंको ले जाता—प्राप्त करा देता है ॥ १० ॥ |
य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥
जो विद्वान् प्राणको इस प्रकार जानता है उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती। वह अमर हो जाता है। इस विषयमें यह श्लोक है ॥ ११ ॥
| यः कश्चिदेवं विद्वान्यथोक्तविशेषणैर्विशिष्टमुत्पत्त्यादिभिः | जो कोई विद्वान् पुरुष इस प्रकार उपर्युक्त विशेषणोंसे विशिष्ट |
प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
| प्राणं वेद जानाति तस्येदं फलम् ऐहिकमामुष्मिकं चोच्यते । न हास्य नैवास्य विदुषः प्रजा पुत्रपौत्रादिलक्षणा हीयते छिद्यते । पतिते च शरीरे प्राणसायुज्यतयामृतोऽमरणधर्मा भवति तदेतस्मिन्नर्थे संक्षेपाभिधायक एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ ११ ॥ | प्राणको उसके उत्पत्ति आदिके सहित जानता है उसके लिये यह लौकिक और पारलौकिक फल बतलाया जाता है—'इस विद्वान्की पुत्र-पौत्रादिरूप प्रजा हीन—उच्छिन्न अर्थात् नष्ट नहीं होती तथा शरीरके पतित होनेपर प्राणसायुज्यको प्राप्त हो जानेके कारण वह अमृत—अमरणधर्मा हो जाता है। इस विषयमें संक्षेपसे बतलानेवाला यह श्लोक यानी मन्त्र है—॥ ११ ॥ |
उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।
अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते
विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२॥
प्राणकी उत्पत्ति, आगमन, स्थान, व्यापकता एवं बाह्य और आध्यात्मिक भेदसे पाँच प्रकार स्थिति जानकर मनुष्य अमरत्व प्राप्त कर लेता है—अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥
| उत्पत्तिं परमात्मनः प्राणस्यायतिमागमनं मनोकृतेनास्मिन् शरीरे स्थानं स्थितिं च पायूपस्थादिस्थानेषु विभुत्वं च स्वाम्यमेव सम्राडिव प्राणवृत्तिभेदानां पञ्चधा स्थापनं बाह्यमादित्यादिरूपेण | प्राणकी परमात्मासे उत्पत्ति, आयति—मनके सङ्कल्पसे इस शरीरमें आगमन, स्थान—पायु-उपस्थादिमें स्थित होना, विभुत्व—सम्राट्के समान प्रभुत्व यानी प्राणके वृत्तिभेदको पाँच प्रकारसे स्थापित करना, तथा आदित्यादि- |
| ४८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
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| अध्यात्मं चैव चक्षुराद्याकारेण अवस्थानं विज्ञायैवं प्राणममृतम् अश्नुत इति विज्ञायामृतमश्नुत इति द्विर्वचनं प्रश्नार्थपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १२ ॥ | रूपसे बाह्य और चक्षु आदिरूपसे आन्तरिक स्थिति—इस प्रकार प्राणको जानकर मनुष्य अमरत्व प्राप्त कर लेता है। यहाँ 'विज्ञायामृतमश्नुते' इस पदकी द्विरुक्ति प्रश्नार्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १२ ॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये तृतीयः प्रश्नः ॥ ३ ॥
चतुर्थ प्रश्न (सुषुप्ति, स्वप्न व अक्षरब्रह्मज्ञान)
चतुर्थ प्रश्न
गार्ग्यका प्रश्न—सुषुप्तिमें कौन सोता है और कौन जागता है ?
अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥
तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनिसे सूर्यके पौत्र गार्ग्यने पूछा—'भगवन् ! इस पुरुषमें कौन [ इन्द्रियाँ ] सोती हैं ? कौन इसमें जागती हैं ? कौन देव स्वप्नोंको देखता है ? किसे यह सुख अनुभव होता है ? तथा किसमें ये सब प्रतिष्ठित हैं ?' ॥ १ ॥
| अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । प्रश्नत्रयेणापरविद्यागोचरं सर्वं परिसमाप्य संसारं व्याकृतविषयं साध्यसाधनलक्षणमनित्यम्; अथेदानीमसाध्यसाधनलक्षणमप्राणममनोगोचरम् अतीन्द्रियविषयं शिवं शान्तम् अविकृतमक्षरं सत्यं परविद्यागम्यं पुरुषाख्यं सबाह्याभ्यन्तरमजं वक्तव्यमित्युत्तरं प्रश्नत्रयम् आरभ्यते । | तदनन्तर उनसे सौर्यायणी गार्ग्यने पूछा । उपर्युक्त तीन प्रश्नोंमें अपरा विद्याके विषय व्याकृताश्रित साध्यसाधनरूप अनित्य संसारका निरूपण समाप्त कर अब साध्य-साधनसे अतीत तथा प्राण, मन और इन्द्रियोंके अविषय, परविद्यावेद्य, शिव, शान्त, अविकारी, अक्षर, सत्य और बाहर-भीतर विद्यमान अजन्मा पुरुष नामक तत्त्वका वर्णन करना है; इसीलिये आगेके तीन प्रश्नोंका आरम्भ किया जाता है । |
४
| ५० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तत्र सुदीप्तादिवाग्नेर्यथात्<br>परादक्षरात्सर्वे भावा विस्फुलिङ्गा<br>इव जायन्ते तत्र चैवापियन्ति<br>इत्युक्तं द्वितीये मुण्डके ; के ते<br>सर्वे भावा अक्षराद्विभज्यन्ते ?<br>कथं वा विभक्ताः सन्तस्तत्रैव<br>अपियन्ति ? किंलक्षणं वा तद-<br>क्षरमिति ? एतद्विवक्षयाधुना<br>प्रश्नान् उद्भावयति—<br><br>भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे शिरः-<br>पाण्यादिमति कानि करणानि<br>स्वपन्ति स्वापं कुर्वन्ति स्वव्या-<br>पारादुपरमन्ते कानि चास्मिन्<br>जाग्रति जागरणमनिद्रावस्थां स्व-<br>व्यापारं कुर्वन्ति। कतरः कार्यकारण-<br>लक्षणयोरेष देवः स्वप्नान्पश्यति ?<br>स्वप्नो नाम जाग्रद्दर्शनान्निवृत्तस्य<br>जाग्रद्वदन्तःशरीरे यद्दर्शनम् ।<br>तत्किं कार्यलक्षणेन देवेन | तहाँ, द्वितीय मुण्डकमें यह बात कही गयी है कि 'अच्छी तरह प्रज्वलित हुए अग्निसे स्फुलिङ्गों (चिनगारियों) के समान जिस पर अक्षरसे सम्पूर्ण भाव पदार्थ उत्पन्न होते और उसीमें लीन हो जाते हैं' इत्यादि; सो उस अक्षर परमात्मासे अभिव्यक्त होनेवाले वे सम्पूर्ण भाव कौन-से हैं ? उससे विभक्त होकर वे किस प्रकार उसीमें लीन होते हैं ? तथा वह अक्षर किन लक्षणोंवाला है ? यह सब बतलानेके लिये अब श्रुति आगेके प्रश्न उठाती है—<br><br>भगवन् ! शिर और हाथ-पैरोंवाले इस पुरुषमें कौन इन्द्रियाँ सोती—निद्रा लेती अर्थात् अपने व्यापारसे उपरत होती हैं ? तथा कौन इसमें जागती यानी जागरण—अनिद्रावस्था अर्थात् अपना व्यापार करती हैं ? कार्य-करणरूप [यानी देहेन्द्रियरूप] देवोंमेंसे कौन देव स्वप्नोंको देखता है ? जाग्रद्दर्शनसे निवृत्त हुए जीवका जो अन्तःकरणमें जाग्रत्के समान विषयोंको देखना है उसे स्वप्न कहते हैं । सो यह कार्य कोई कार्यरूप देव निष्पन्न करता |
| प्रश्न ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१ | | :--- | :--- |
| निर्वर्त्यते किं वा करणलक्षणेन केनचिदित्यभिप्रायः । | है, अथवा करणरूप देव ? यह इसका अभिप्राय है । |
|---|---|
| उपरते च जाग्रत्स्वप्नव्यापारे यत्प्रसन्नं निरायासलक्षणमनाबाधं सुखं कस्यैतद्भवति । तस्मिन्काले जाग्रत्स्वप्नव्यापाराद् उपरताः सन्तः कस्मिन्नु सर्वे सम्यगेकीभूताः संप्रतिष्ठिताः । मधुनि रसवत्समुद्रप्रविष्टनद्यादिवच्च विवेकानर्हाः प्रतिष्ठिता भवन्ति संगताः संप्रतिष्ठिता भवन्तीत्यर्थः । | तथा जाग्रत् और स्वप्नका व्यापार समाप्त हो जानेपर जो प्रसन्न, अनायासरूप एवं निर्बाध सुख होता है वह भी किसे होता है ? उस समय जाग्रत् और स्वप्नके व्यापारसे उपरत होकर सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भली प्रकार एकीभूत होकर किसमें स्थित होती हैं ? अर्थात् मधुमें रसोंके समान तथा समुद्रमें प्रविष्ट हुई नदी आदिके समान विवेचनके (पृथक्-प्रतीतिके) अयोग्य होकर वे किसमें भली प्रकार प्रतिष्ठित अर्थात् सम्मिलित हो जाती हैं ? |
| ननु न्यस्तदात्रादिकरणवत् स्वव्यापारादुपरतानि पृथक्पृथगेव स्वात्मन्यवतिष्ठन्त इत्येतद्युक्तं कुतः प्राप्तिः सुषुप्तपुरुषाणां करणानां कस्मिंश्चिदेकीभावगमनाशङ्कायाः प्रष्टुः । | शङ्का—[काम करनेके अनन्तर] छोड़े हुए दराँती आदि करणों (औजारों) के समान इन्द्रियाँ भी अपने-अपने व्यापारसे निवृत्त होकर अलग-अलग अपनेमें ही स्थित हो जाती हैं—ऐसा समझना ठीक ही है । फिर प्रश्नकर्ताको सोये हुए पुरुषोंकी इन्द्रियोंके किसीमें एकीभाव हो जानेकी आशङ्का कैसे प्राप्त हो सकती है ? |
५२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४
| युक्तैव त्वाशङ्का । यतः संहतानि करणानि स्वाम्यर्थानि परतन्त्राणि च जाग्रद्विषये तस्मात् स्वापेऽपि संहतानां पारतन्त्र्येणैव कस्मिंश्चित्संगतिर्न्याय्येति तस्माद् आशङ्कानुरूप एव प्रश्नोऽयम् । अत्र तु कार्यकारणसंघातो यस्मिंश्च प्रलीनः सुषुप्तप्रलयकालयोस्तद्विशेषं बुभुत्सोः स को नु स्यादिति कस्मिन्सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥ | समाधान—यह आशङ्का तो उचित ही है, क्योंकि भूतोंके संघातसे उत्पन्न हुई इन्द्रियाँ अपने स्वामीके लिये प्रवृत्त होनेवाली होनेसे जाग्रत्कालमें भी परतन्त्र ही हैं; अतः सुषुप्तिमें भी उन संहत इन्द्रियोंका परतन्त्ररूपसे ही किसीमें मिलना उचित है । इसलिये यह प्रश्न आशङ्काके अनुरूप ही है । यहाँ पूछनेवालेका यह प्रश्न कि 'वह कौन है?' 'वे सब किसमें प्रतिष्ठित होती हैं?' सुषुप्ति और प्रलयकालमें जिसमें यह कार्य-करणका संघात लीन होता है उसकी विशेषता जाननेके लिये है ॥ १ ॥ |
इन्द्रियोंका लयस्थान आत्मा है
तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति । तेन तर्ह्येष पुरुषो न श्रृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥
प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
तब उससे उस (आचार्य) ने कहा—'हे गार्ग्य ! जिस प्रकार सूर्यके अस्त होनेपर सम्पूर्ण किरणें उस तेजोमण्डलमें ही एकत्रित हो जाती हैं और उसका उदय होनेपर वे फिर फैल जाती हैं। उसी प्रकार वे सब [इन्द्रियाँ] परमदेव मनमें एकीभावको प्राप्त हो जाती हैं। इससे तब वह पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न चखता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनन्द भोगता है, न मलोत्सर्ग करता है, और न कोई चेष्टा करता है। तब उसे 'सोता है' ऐसा कहते हैं ॥ २ ॥
| तस्मै स होवाचाचार्यः—<br>शृणु हे गार्ग्य यत्त्वया पृष्टम् ।<br>यथा मरीचयो रश्मयोऽर्कस्य<br>आदित्यस्यास्तमदर्शनं गच्छतः<br>सर्वा अशेषत एतस्मिंस्तेजोमण्डले<br>तेजोराशिरूप एकीभवन्ति<br>विवेकानर्हत्वमविशेषतां गच्छन्ति<br>मरीचयस्तस्यैवार्कस्य ताः पुनः<br>पुनरुदयत उद्गच्छतः प्रचरन्ति<br>विकीर्यन्ते । यथायं दृष्टान्तः,<br>एवं ह वै तत्सर्वं विषयेन्द्रियादि-<br>जातं परे प्रकृष्टे देवे द्योतन-<br>वति मनसि चक्षुरादिदेवानां<br>मनस्तन्त्रत्वात्परो देवो मनः<br>तस्मिन्स्वापकाल एकीभवति । | आचार्यने उस प्रश्नकर्तासे कहा—हे गार्ग्य ! तूने जो पूछा है सो सुन—जिस प्रकार अर्क—सूर्यके अस्त—अदर्शनको प्राप्त होते समय सम्पूर्ण मरीचियाँ—किरणें उस तेजोमण्डल—तेजपुञ्ज-रूप सूर्यमें एकत्रित हो जाती हैं अर्थात् अविवेचनीयता–अविशेषता-को प्राप्त हो जाती हैं, तथा उसी सूर्यके पुनः उदित होनेके समय–उससे निकलकर फैल जाती हैं; जैसा यह दृष्टान्त है उसी प्रकार वह विषय और इन्द्रियोंका सम्पूर्ण समूह स्वापकालमें परम—प्रकृष्ट देव—द्योतनवान् मनमें—चक्षु आदि देव (इन्द्रियाँ) मनके अधीन हैं, इसलिये मन परमदेव है, उसमें एक हो जाता है। अर्थात् सूर्य- |
५४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४
| मण्डले मरीचिवदविशेषतां गच्छति । जिजागरिषोश्च रश्मिवन्मण्डलान्मनस एव प्रचरन्ति स्वव्यापाराय प्रतिष्ठन्ते । <br><br> यस्मात्स्वप्नकाले श्रोत्रादीनि शब्दाद्युपलब्धिकरणानि मनसि एकीभूतानीव करणव्यापाराद् उपरतानि तेन तस्मात्तर्हि तस्मिन् स्वापकाल एष देवदत्तादिलक्षणः पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते लौकिकाः ॥ २ ॥ | मण्डलमें किरणोंके समान उससे अभिन्नताको प्राप्त हो जाता है । तथा [उदित होते हुए] सूर्यमण्डलसे किरणोंके समान वे (इन्द्रियाँ) जागनेकी इच्छावाले पुरुषके मनसे ही फिर फैल जाती हैं; अर्थात् अपने व्यापारके लिये प्रवृत्त हो जाती हैं । <br><br> क्योंकि निद्राकालमें शब्दादि विषयोंकी उपलब्धिके साधनरूप श्रोत्रादि मनमें एकीभावको प्राप्त हुएके समान इन्द्रिय-व्यापारसे उपरत हो जाते हैं इसलिये उस निद्राकालमें वह देवदत्तादिरूप पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न चखता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनन्द भोगता है, न त्यागता है और न चेष्टा करता है । उस समय लौकिक पुरुष उसे 'सोता है' ऐसा कहते हैं ॥ २ ॥ |
सुषुप्तिमें जागनेवाले प्राण-भेद गार्हपत्यादि अग्निरूप हैं
प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५
[ सुषुप्तिकालमें ] इस शरीररूप पुरमें प्राणाग्नि ही जागते हैं । यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन है तथा जो गार्हपत्यसे ले जाया जाता है वह प्राण ही प्रणयन ( ले जाये जाने ) के कारण आहवनीय अग्नि है ॥ ३ ॥
| सुप्तवत्सु श्रोत्रादिषु करणेषु एतस्मिन्पुरे नवद्वारे देहे प्राणाग्नयः प्राणा एव पञ्च वायवोऽग्नय इवाग्नयो जाग्रति । अग्निसामान्यं हि आह—गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानः । कथमित्याह—यस्माद्गार्हपत्यादग्नेरग्निहोत्रकाल इतरोऽग्निः आहवनीयः प्रणीयते प्रणयनात् प्रणीयतेऽस्मादिति प्रणयनो गार्हपत्योऽग्निः । तथा सुप्तस्यापानवृत्तेः प्रणीयत इव प्राणो मुखनासिकाभ्यां संचरत्यत आहवनीयस्थानीयः प्राणः। व्यानस्तु हृदयाद्दक्षिणसुषिरद्वारेण निर्गमाद्दक्षिणदिक्सम्बन्धादन्वाहार्यपचनो दक्षिणाग्निः ॥ ३ ॥ | इस पुर यानी नौ द्वारवाले देहमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंके सो जानेपर प्राणाग्नि—प्राणादि पाँच वायु ही अग्निके समान अग्नि हैं, वे ही जागते हैं । अब अग्निके साथ उनकी समानता बतलाते हैं—यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है । किस प्रकार है, सो बतलाते हैं—क्योंकि अग्निहोत्रके समय गार्हपत्य अग्निसे ही आहवनीय नामक दूसरा अग्नि [जिसमें कि हवन किया जाता है] सम्पन्न किया जाता है; अतः प्रणयन किये जानेके कारण 'प्रणीयतेऽस्मात्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वह गार्हपत्याग्नि 'प्रणयन' है । इसी प्रकार प्राण भी सोये हुए पुरुषकी अपानवृत्तिसे प्रणीत हुआ-सा ही मुख और नासिकाद्वारा सञ्चार करता है; अतः वह आहवनीयस्थानीय है । तथा व्यान हृदयके दक्षिण छिद्रद्वारा निकलनेके कारण दक्षिण-दिशाके सम्बन्धसे अन्वाहार्यपचन यानी दक्षिणाग्नि है ॥ ३ ॥ |
| ५६ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४. |
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| अत्र च होताऽग्निहोत्रस्य— | यहाँ [अगले वाक्यसे] अग्निहोत्रके होता (ऋत्विक्) का वर्णन किया जाता है— |
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प्राणाग्निके ऋत्विक्
यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनो ह वाव यजमानः । इष्टफलमेवोदानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४ ॥
क्योंकि उच्छ्वास और निःश्वास ये मानो अग्निहोत्रकी आहुतियाँ हैं, उन्हें जो [शरीरकी स्थितिके लिये] समभावसे विभक्त करता है वह समान [ऋत्विक् है]; मन ही निश्चय यजमान है, और इष्टफल ही उदान है; वह उदान इस मनरूप यजमानको नित्यप्रति ब्रह्मके पास पहुँचा देता है ॥ ४ ॥
| यद्यस्मादुच्छ्वासनिश्वासौ अग्निहोत्राहुती इव नित्यं द्वित्वसामान्यादेव त्वेतावाहुती समं साम्येन शरीरस्थितिभावाय नयति यो वायुरग्निस्थानीयोऽपि होता चाहुत्योर्नेतृत्वात् । कोऽसौ स समानः । अतश्च विदुषः स्वापोऽप्यग्निहोत्रहवनमेव । तस्माद्विद्वान्नाकर्मीत्येवं मन्तव्य इत्यभिप्रायः । सर्वदा सर्वाणि | क्योंकि उच्छ्वास और निःश्वास अग्निहोत्रकी आहुतियोंके समान हैं, अतः [इनमें और अग्निहोत्रकी आहुतियोंमें] समानरूपसे द्वित्व होनेके कारण जो वायु शरीरकी स्थितिके लिये इन दोनों आहुतियोंको साम्यभावसे सर्वदा चलाता है वह [पूर्वमन्त्रके अनुसार] अग्निस्थानीय होनेपर भी आहुतियोंका नेता होनेके कारण होता ही है। वह है कौन ? समान । अतः विद्वान्की निद्रा भी अग्निहोत्रका हवन ही है । इसलिये अभिप्राय यह है कि विद्वान्को अकर्मा नहीं मानना चाहिये । इसीसे |
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प्रश्न.४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
| भूतानि विचिन्वन्त्यपि स्वपत इति हि वाजसनेयके। | वृहदारण्यकोपनिषद्में भी कहा है कि उस विद्वान्के सोनेपर भी सत्र भूत सर्वदा चयन (यागानुष्ठान) किया करते हैं। |
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| अत्र हि जाग्रत्सु प्राणाग्निषूपसंहृत्य बाह्यकरणानि विषयांच्च अग्निहोत्रफलमिव स्वर्गं ब्रह्म जिगमिषुर्मनो ह वाव यजमानो जागर्ति यजमानवत्कार्यकरणेषु प्राधान्येन संव्यवहारात्स्वर्गमिव ब्रह्म प्रति प्रस्थितत्वाद्यजमानो मनः कल्प्यते । | इस अवस्थामें बाह्य इन्द्रियों और विषयोंको पञ्च प्राणरूप जागते हुए (प्रज्वलित) अग्निमें हवन कर मनरूप यजमान अग्निहोत्रके फल स्वर्गके समान ब्रह्मके प्रति जानेकी इच्छासे जागता रहता है। यजमानके समान भूत और इन्द्रियोंमें प्रधानतासे व्यवहार करने और स्वर्गके समान ब्रह्मके प्रति प्रस्थित होनेसे मन यजमानरूपसे कल्पना किया गया है। |
| इष्टफलं यागफलमेवोदानो वायुः । उदाननिमित्तत्वादिष्टफलप्राप्तेः । कथम् ? स उदानो मनआख्यं यजमानं स्वप्नवृत्तिरूपादपि प्रच्याव्याहरहः सुषुप्तिकाले स्वर्गमिव ब्रह्माक्षरं गमयति । अतो यागफलस्थानीय उदानः ॥ ४ ॥ | उदानवायु ही इष्टफल यानी यज्ञका फल है, क्योंकि इष्टफलकी प्राप्ति उदानवायुके निमित्तसे ही होती है। किस प्रकार? [सो बतलाते हैं—] वह उदान वायु इस मन नामक यजमानको स्वप्नवृत्तिसे भी गिराकर नित्यप्रति सुषुप्तिकालमें स्वर्गके समान अक्षर ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। अतः उदान यागफलस्थानीय है ॥ ४ ॥ |
| एवं विदुषः श्रोत्राद्युपरमकालादारभ्य यावत्सुप्तोत्थितो | इस प्रकार विद्वान्को श्रोत्रादि इन्द्रियोंके उपरत होनेके समयसे |
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| ५८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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| भवति तावत्सर्वयागफलानुभव एव नाविदुषामिवानर्थायेति विद्वत्ता स्तूयते। न हि विदुष एव श्रोत्रादीनि स्वपन्ते प्राणाग्नयो वा जाग्रति जाग्रत्स्वप्नयोर्मनः स्वातन्त्र्यमनुभवदहरहः सुषुप्तं वा प्रतिपद्यते। समानं हि सर्वप्राणिनां पर्यायेण जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिगमनमतो विद्वत्तास्तुतिरेव इयमुपपद्यते। यत्पृष्टं कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यतीति तदाह— | लेकर जबतक वह सोनेसे उठता है तबतक सम्पूर्ण यज्ञोंका फल ही अनुभव होता है, अज्ञानियोंके समान [उसकी निद्रा] अनर्थकी हेतु नहीं होती—ऐसा कहकर विद्वत्ताकी ही स्तुति की गयी है, क्योंकि केवल विद्वान्की ही श्रोत्रादि इन्द्रियाँ सोती और प्राणाग्नियाँ जागती हैं तथा उसीका मन जाग्रत् और सुषुप्तिमें स्वतन्त्रताका अनुभव करता हुआ रोज-रोज सुषुप्तिको प्राप्त होता है—ऐसी बात नहीं है। क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिमें जाना तो सभी प्राणियोंके लिये समान है। अतः यह विद्वत्ताकी स्तुति ही हो सकती है। अब, पहले जो यह पूछा था कि कौन देव स्वप्नोंको देखता है ? सो बतलाते हैं— |
स्वप्नदर्शनका विवरण
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशादिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥
प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
इस स्वप्नावस्थामें यह देव अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसने [जाग्रत्-अवस्थामें] जो देखा होता है उस देखे हुएको ही देखता है, सुनी-सुनी बातोंको ही सुनता है तथा दिशा-विदिशाओंमें अनुभव किये हुएको ही पुनः-पुनः अनुभव करता है। [अधिक क्या] यह देखे, बिना देखे, सुने, बिना सुने, अनुभव किये, बिना अनुभव किये तथा सत् और असत् सभी प्रकारके पदार्थोंको देखता है और स्वयं भी सर्वरूप होकर देखता है॥ ५॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अत्रोपरतेषु श्रोत्रादिषु देहरक्षायै जाग्रत्सु प्राणादिवायुषु प्राक्सुषुप्तिप्रतिपत्तेः एतस्मिन् अन्तराल एष देवोऽर्करश्मिवत् स्वात्मनि संहृतश्रोत्रादिकरणः स्वप्ने महिमानं विभूतिं विषयविषयीलक्षणमनेकात्मभावगमनम् अनुभवति प्रतिपद्यते। | इस अवस्थामें यानी श्रोत्रादि इन्द्रियोंके उपरत हो जानेपर और प्राणादि वायुओंके जागते रहनेपर सुषुप्तिकी प्राप्तिसे पूर्व इस [जाग्रत्-सुषुप्तिके] मध्यकी अवस्थामें यह देव, जिसने सूर्यकी किरणोंके समान श्रोत्रादि इन्द्रियोंको अपनेमें लीन कर लिया है, स्वप्नावस्थामें अपनी महिमा यानी विभूतिको अनुभव करता है अर्थात् विषय-विषयीरूप अनेकात्मत्वको प्राप्त हो जाता है। |
| [मनःस्वातन्त्र्य-विचारः]<br>ननु महिमानुभवे करणं मनोऽनुभवितुस्तत्कथं स्वातन्त्र्येणानुभवति इत्युच्यते स्वतन्त्रो हि क्षेत्रज्ञः। | **पूर्व०—**मन तो विभूतिका अनुभव करनेमें अनुभव करनेवाले पुरुषका करण है; फिर यह कैसे कहा जाता है कि वह स्वतन्त्रतासे अनुभव करता है, क्योंकि स्वतन्त्र तो क्षेत्रज्ञ ही है। |
| नैष दोषः; क्षेत्रज्ञस्य स्वातन्त्र्यस्य मनउपाधिकृतत्वान्न हि | **सिद्धान्ती—**इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि क्षेत्रज्ञकी स्वतन्त्रता मनरूप उपाधिके कारण है, |
| ६० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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| क्षेत्रज्ञः परमार्थतः स्वतः स्वपिति जागर्ति वा। मनउपाधिकृतमेव तस्य जागरणं स्वप्नश्चेत्युक्तं वाजसनेयके "सधीः स्वप्नो भूत्वा ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ०उ० ४।३।७)*इत्यादि। तस्मान्मनसो विभूत्यनुभवे स्वातन्त्र्यवचनं न्याय्यमेव। | वास्तवमें क्षेत्रज्ञ तो स्वयं न सोता है और न जागता ही है। उसका जागना और सोना तो मनरूप उपाधिके ही कारण है—ऐसा बृहदारण्यक श्रुतिमें कहा है—"वह बुद्धिसे तादात्म्य प्राप्त कर स्वप्नरूप होता है और मानो ध्यान करता तथा चेष्टा करता है" इत्यादि। अतः विभूतिके अनुभवमें मनकी स्वतन्त्रता बतलाना न्याययुक्त ही है। |
| पुरुषस्य स्वयंज्योतिष्ट्व-स्थापनम् — मनउपाधिसहितत्वे स्वप्नकाले क्षेत्रज्ञस्य स्वयंज्योतिष्ट्वं बाध्यतेति केचित्। तन्न, श्रुत्यर्थापरिज्ञानकृता भ्रान्तिस्तेषाम्। यस्मात्स्वयंज्योतिष्ट्वादिव्यवहारोऽप्यामोक्षान्तः सर्वोऽविद्याविषय एव मनआद्युपाधिजनितः। "यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" (बृ० उ० ४।३।३१) "मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति"। "यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्" | किन्हीं-किन्हींका कथन है कि स्वप्नकालमें मनरूप उपाधिके सहित माननेमें क्षेत्रज्ञकी स्वयंप्रकाशतामें बाधा आवेगी सो ऐसी बात नहीं है। उनकी यह भ्रान्ति श्रुत्यर्थको न जाननेके ही कारण है, क्योंकि मन आदि उपाधिसे प्राप्त हुआ स्वयंप्रकाशत्व आदि व्यवहार भी मोक्षपर्यन्त सब-का-सब अविद्याके कारण ही है। जैसा कि "जहाँ कोई अन्य-सा हो वहीं अन्यको अन्य देख सकता है" "इस आत्माको विषयका संसर्ग ही नहीं होता" "जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया वहाँ किसे किसके द्वारा |
* बृहदारण्यकोपनिषद्में इस श्रुतिका पाठ इस प्रकार है—'ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वा'।
| प्रश्न ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६१ |
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| ( बृ० उ० २ । ४ । १४ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अतो मन्द-ब्रह्मविदामेवेयमाशङ्का न तु एकात्मविदाम् । | देखे ?" इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । अतः यह शङ्का मन्द ब्रह्मज्ञानियोंकी ही है, एकात्मवेत्ताओंकी नहीं । |
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| नन्वेवं सति "अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः" ( बृ० उ० ४ । ३ । १४ ) इति विशेषणमनर्थकं भवति । | पूर्व०—ऐसा माननेपर तो "इस स्वप्नावस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति है" इस वाक्यसे बतलाया हुआ आत्माका [स्वयंज्योति] विशेषण व्यर्थ हो जायगा । |
| अत्रोच्यते; अत्यल्पमिदम् उच्यते "य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते" ( बृ० उ० २ । १ । १७ ) इत्यन्तर्हृदय-परिच्छेदे सुतरां स्वयंज्योतिष्ट्वं बाध्येत । | सिद्धान्ती—इसपर हमें यह कहना है कि आपका यह कथन तो बहुत थोड़ा है । "यह जो हृदयके भीतरका आकाश है उसमें वह (आत्मा) शयन करता है" इस वाक्यसे आत्माका अन्तर्हृदयरूप-परिच्छेद सिद्ध होनेसे तो उसका स्वयंप्रकाशत्व और भी बाधित हो जाता है । |
| सत्यमेवमयं दोषो यद्यपि स्यात्स्वप्ने केवलतया स्वयंज्योतिष्ट्वेनार्धं तावदपनीतं भारस्येति चेत् । | पूर्व०—यद्यपि यह दोष तो ठीक ही है; तथापि स्वप्नमें केवलतां (मनका अभाव हो जाने) के कारण आत्माके स्वयंप्रकाशत्वसे उसका आधा भार¹ तो हल्का हो ही जाता है । |
¹ १. यहाँ भार हल्का होनेका अभिप्राय है स्वयंप्रकाशताके प्रतिबन्धकका दूर होना ।
६२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४
| न; तत्रापि “पुरीतति शेते” (बृ० उ० २।१।१९) इति श्रुतेः पुरीतन्नाडीसम्बन्धादत्रापि पुरुषस्य स्वयंज्योतिष्ट्वेनार्ध-भारापनयाभिप्रायो मृषैव । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; उस अवस्थामें भी “पुरीतत् नाडीमें शयन करता है” इस श्रुतिके अनुसार जीवका पुरीतत् नाडीसे सम्बन्ध रहनेके कारण यह अभिप्राय मिथ्या ही है कि उसका आधा भार निवृत्त हो जाता है । |
| कथं तर्हि “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः” (बृ० उ० ४।३।१४) इति । | **पूर्व०—**तो फिर यह कैसे कहा गया है कि ‘इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है’ ? |
| अन्यशाखात्पादनपेक्षा सा श्रुतिरिति चेत् । | **मध्यस्थ—**यदि ऐसा मानें कि अन्य शाखाकी श्रुति * होनेके कारण यहाँ उसकी कोई अपेक्षा नहीं है, तो ? |
| न; अर्थैकत्वस्येष्टत्वादेको ह्यात्मा सर्ववेदान्तानामर्थो विविज्ञापयिषितो बुभुत्सितश्च । तस्माद्युक्ता स्वप्न आत्मनः स्वयं-ज्योतिष्ट्वोपपत्तिर्वक्तुम् । श्रुते-र्यथार्थतत्त्वप्रकाशकत्वात् । | **पूर्व०—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि हमें सब श्रुतियोंके अर्थकी एकता ही इष्ट है । सम्पूर्ण वेदान्तोंका तात्पर्य एक आत्मा ही है; वही उन्हें बतलाना इष्ट है और वही जिज्ञासुओंको ज्ञातव्य है । इसलिये स्वप्नमें आत्माकी स्वयंप्रकाशताकी उपपत्ति बतलाना उचित है, क्योंकि श्रुति यथार्थ तत्त्वको ही प्रकाशित करनेवाली है । |
| एवं तर्हि शृणु श्रुत्यर्थं हित्वा सर्वमभिमानं न त्वभिमानेन | **सिद्धान्ती—**अच्छा तो अब सब प्रकारका अभिमान त्यागकर श्रुतिका |
* क्योंकि यह उपनिषद् अथर्ववेदीय है और ‘अत्रायं पुरुषः’ आदि श्रुति यजुर्वेदीय काण्व-शाखाकी है ।