प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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५४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४
| मण्डले मरीचिवदविशेषतां गच्छति । जिजागरिषोश्च रश्मिवन्मण्डलान्मनस एव प्रचरन्ति स्वव्यापाराय प्रतिष्ठन्ते । <br><br> यस्मात्स्वप्नकाले श्रोत्रादीनि शब्दाद्युपलब्धिकरणानि मनसि एकीभूतानीव करणव्यापाराद् उपरतानि तेन तस्मात्तर्हि तस्मिन् स्वापकाल एष देवदत्तादिलक्षणः पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते लौकिकाः ॥ २ ॥ | मण्डलमें किरणोंके समान उससे अभिन्नताको प्राप्त हो जाता है । तथा [उदित होते हुए] सूर्यमण्डलसे किरणोंके समान वे (इन्द्रियाँ) जागनेकी इच्छावाले पुरुषके मनसे ही फिर फैल जाती हैं; अर्थात् अपने व्यापारके लिये प्रवृत्त हो जाती हैं । <br><br> क्योंकि निद्राकालमें शब्दादि विषयोंकी उपलब्धिके साधनरूप श्रोत्रादि मनमें एकीभावको प्राप्त हुएके समान इन्द्रिय-व्यापारसे उपरत हो जाते हैं इसलिये उस निद्राकालमें वह देवदत्तादिरूप पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न चखता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनन्द भोगता है, न त्यागता है और न चेष्टा करता है । उस समय लौकिक पुरुष उसे 'सोता है' ऐसा कहते हैं ॥ २ ॥ |
सुषुप्तिमें जागनेवाले प्राण-भेद गार्हपत्यादि अग्निरूप हैं
प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥