भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३


तब उससे उस (आचार्य) ने कहा—'हे गार्ग्य ! जिस प्रकार सूर्यके अस्त होनेपर सम्पूर्ण किरणें उस तेजोमण्डलमें ही एकत्रित हो जाती हैं और उसका उदय होनेपर वे फिर फैल जाती हैं। उसी प्रकार वे सब [इन्द्रियाँ] परमदेव मनमें एकीभावको प्राप्त हो जाती हैं। इससे तब वह पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न चखता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनन्द भोगता है, न मलोत्सर्ग करता है, और न कोई चेष्टा करता है। तब उसे 'सोता है' ऐसा कहते हैं ॥ २ ॥

तस्मै स होवाचाचार्यः—<br>शृणु हे गार्ग्य यत्त्वया पृष्टम् ।<br>यथा मरीचयो रश्मयोऽर्कस्य<br>आदित्यस्यास्तमदर्शनं गच्छतः<br>सर्वा अशेषत एतस्मिंस्तेजोमण्डले<br>तेजोराशिरूप एकीभवन्ति<br>विवेकानर्हत्वमविशेषतां गच्छन्ति<br>मरीचयस्तस्यैवार्कस्य ताः पुनः<br>पुनरुदयत उद्गच्छतः प्रचरन्ति<br>विकीर्यन्ते । यथायं दृष्टान्तः,<br>एवं ह वै तत्सर्वं विषयेन्द्रियादि-<br>जातं परे प्रकृष्टे देवे द्योतन-<br>वति मनसि चक्षुरादिदेवानां<br>मनस्तन्त्रत्वात्परो देवो मनः<br>तस्मिन्स्वापकाल एकीभवति ।आचार्यने उस प्रश्नकर्तासे कहा—हे गार्ग्य ! तूने जो पूछा है सो सुन—जिस प्रकार अर्क—सूर्यके अस्त—अदर्शनको प्राप्त होते समय सम्पूर्ण मरीचियाँ—किरणें उस तेजोमण्डल—तेजपुञ्ज-रूप सूर्यमें एकत्रित हो जाती हैं अर्थात् अविवेचनीयता–अविशेषता-को प्राप्त हो जाती हैं, तथा उसी सूर्यके पुनः उदित होनेके समय–उससे निकलकर फैल जाती हैं; जैसा यह दृष्टान्त है उसी प्रकार वह विषय और इन्द्रियोंका सम्पूर्ण समूह स्वापकालमें परम—प्रकृष्ट देव—द्योतनवान् मनमें—चक्षु आदि देव (इन्द्रियाँ) मनके अधीन हैं, इसलिये मन परमदेव है, उसमें एक हो जाता है। अर्थात् सूर्य-