प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
| ११० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| करणाधारमन्तरात्मानमसृजत सृष्टवान् । अतः प्राणाच्छ्रद्धां सर्वप्राणिनां शुभकर्मप्रवृत्तिहेतुभूताम् । ततः कर्मफलोपभोगसाधनाधिष्ठानानि कारणभूतानि महाभूतान्यसृजत ।<br><br>खं शब्दगुणम् , वायुं स्वेन स्पर्शेन कारणगुणेन च विशिष्टं द्विगुणम् । तथा ज्योतिः स्वेन रूपेण पूर्वाभ्यां च विशिष्टं त्रिगुणं शब्दस्पर्शाभ्याम् । तथापो रसेन गुणेनासाधारणेन पूर्वगुणानुप्रवेशेन च चतुर्गुणाः। तथा गन्धगुणेन पूर्वगुणानुप्रवेशेन च पञ्चगुणा पृथिवी । तथा तैरेव भूतैरारब्धमिन्द्रियं द्विप्रकारं बुद्धयर्थं कर्मार्थं च दशसंख्याकम् । तस्य चेश्वरमन्तःस्थं संशयसङ्कल्पलक्षणं मनः । | इन्द्रियोंके आधारस्वरूप अन्तरात्माको रचा । उस प्राणसे समस्त प्राणियोंकी प्रवृत्तिकी हेतुभूता श्रद्धाकी रचना की । और उससे कर्मफलोपभोगके साधन ( शरीर ) के अधिष्ठान अर्थात् कारणस्वरूप महाभूतोंकी सृष्टि की ।<br><br>सबसे पहले शब्दगुणविशिष्ट आकाशको रचा, फिर निजगुण स्पर्श और शब्दगुणसे युक्त होनेके कारण दो गुणवाले वायुको, तदनन्तर स्वकीय गुण रूप और पहले दो गुण शब्द-स्पर्शसे युक्त तीन गुणवाले तेजको, तथा अपने असाधारण गुण रसके सहित पूर्वगुणोंके अनुप्रवेशसे चार गुणवाले जलको और गन्धगुणके सहित पूर्वगुणोंके अनुप्रवेशसे पाँच गुणोंवाली पृथिवीको रचा । इसी प्रकार विषयोंके ज्ञान और कर्मके लिये उन भूतोंसे ही आरब्ध दश संख्यावाले दो प्रकारके इन्द्रियग्रामकी तथा उसके स्वामी सङ्कल्पविकल्पादिरूप अन्तःस्थित मनकी रचना की । |
| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १११ |
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| एवं प्राणिनां कार्यं करणं च सृष्ट्वा तत्स्थित्यर्थं व्रीहियवादि-लक्षणमन्नम् । ततश्चान्नादद्य-मानाद्वीर्यं सामर्थ्यं बलं सर्वकर्म-प्रवृत्तिसाधनम् । तद्वीर्यवतां च प्राणिनां तपो विशुद्धिसाधनं सङ्कीर्यमाणानाम् । मन्त्रास्तपो-विशुद्धान्तर्बहिःकरणेभ्यः कर्म-साधनभूता ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गि-रसः । ततः कर्माग्निहोत्रादि-लक्षणम् । ततो लोकाः कर्मणां फलम् । तेषु च सृष्टानां प्राणिनां नाम च देवदत्तो यज्ञदत्त इत्यादि ।<br><br>एवमेताः कलाः प्राणिनाम् अविद्यादिदोषबीजापेक्षया सृष्टाः तैमिरिकदृष्टिसृष्टा इव द्विचन्द्र-मशकमक्षिकाद्याः स्वप्नदृक्सृष्टा इव च सर्वपदार्थाः पुनस्तस्मिन्नेव पुरुषे प्रलीयन्ते हित्वा नामरूपादि-विभागम् ॥ ४ ॥ | इस प्रकार प्राणियोंके कार्य (विषय) और करणों (इन्द्रियों) की रचना कर उनकी स्थितिके लिये उसने अन्न उत्पन्न किया। फिर उस खाये हुए अन्नसे सब प्रकारके कर्मोंकी प्रवृत्तिका साधनभूत वीर्य-सामर्थ्य यानी बल उत्पन्न किया। तदनन्तर वर्णसंकरताको प्राप्त होते हुए उन वीर्यवान् प्राणियोंकी शुद्धिके साधनभूत तपकी रचना की। फिर जिनके बाह्य और अन्तःकरणोंकी तपसे शुद्धि हो गयी है उन प्राणियोंके लिये कर्मके साधनभूत ऋक्, यजुः, साम और अथर्वाङ्गिरस मन्त्रोंकी रचना की और तत्पश्चात् अग्निहोत्रादि कर्म तथा कर्मोंके फलस्वरूप लोक निर्माण किये। फिर इस प्रकार रचे हुए उन लोकोंमें प्राणियोंके देवदत्त, यज्ञदत्त आदि नाम बनाये ।<br><br>इस प्रकार तिमिर-रोगीकी दृष्टिसे रचे हुए द्विचन्द्र, मशक (मच्छर) और मक्षिका आदि तथा स्वप्नद्रष्टाके बनाये हुए सब पदार्थोंके समान प्राणियोंके अविद्या आदि दोषरूप बीजकी अपेक्षासे रची हुई ये कलाएँ अपने नाम-रूप आदि विभागको त्यागकर उस पुरुषमें ही लीन हो जाती हैं ॥ ४ ॥ |
११२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ६
नदीके दृष्टान्तसे सम्पूर्ण जगत्का पुरुषाश्रयत्वप्रतिपादन
कथम्— | किस प्रकार ?
स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥
वह [दृष्टान्त] इस प्रकार है—जिस प्रकार समुद्रकी ओर बहती हुई ये नदियाँ समुद्रमें पहुँचकर अस्त हो जाती हैं, उनके नामरूप नष्ट हो जाते हैं, और वे 'समुद्र' ऐसा कहकर ही पुकारी जाती हैं। इसी प्रकार इस सर्वद्रष्टाकी ये सोलह कलाएँ, जिनका अधिष्ठान पुरुष ही है, उस पुरुषको प्राप्त होकर लीन हो जाती हैं। उनके नाम-रूप नष्ट हो जाते हैं और वे 'पुरुष' ऐसा कहकर ही पुकारी जाती हैं। वह विद्वान् कलाहीन और अमर हो जाता है। इस सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है ॥ ५ ॥
| स दृष्टान्तो यथा लोक इमा नद्यः स्यन्दमानाः स्रवन्त्यः समुद्रायणाः समुद्रोऽयनं गतिः आत्मभावो यासां ता समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्योपगम्यास्तं नामरूप-तिरस्कारं गच्छन्ति । तासां | वह दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकार लोकमें निरन्तर प्रवाहरूपसे बहनेवाली तथा समुद्र ही जिनका अयन—गति अर्थात् आत्मभाव है ऐसी ये समुद्रायण नदियाँ समुद्रको प्राप्त होकर अस्त—अदर्शन अर्थात् नाम-रूपके तिरस्कार (अभाव) को प्राप्त हो जाती हैं, तथा इस प्रकार अस्त |
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
| चास्तं गतानां भिद्येते विनश्यतो नामरूपे गङ्गायमुनेत्यादिलक्षणे । तदभेदे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते तद्वस्तूदकलक्षणम् ।<br><br>यथायं दृष्टान्तः, उक्तलक्षणस्य प्रकृतस्यास्य पुरुषस्य परिद्रष्टुः परि समन्ताद्दृष्टुर्दर्शनस्य कर्तुः स्वरूपभूतस्य यथार्कः स्वात्मप्रकाशस्य कर्ता सर्वतः तद्वदिमाः षोडश कलाः प्राणाद्या उक्ताः कलाः पुरुषायणा नदीनामिव समुद्रः पुरुषोऽयनमात्मभावगमनं यासां कलानां ताः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्य पुरुषात्मभावमुपगम्य तथैवास्तं गच्छन्ति। भिद्येते चासां नामरूपे कलानां प्राणाद्याख्या रूपं च यथास्वम्। भेदे च नामरूपयोर्यदनष्टं तत्त्वं पुरुष इत्येवं प्रोच्यते ब्रह्मविद्भिः।<br> ८ | हुई उन नदियोंके वे गङ्गा-यमुना आदि नाम और रूप नष्ट हो जाते हैं और उससे अभेद हो जानेके कारण वह जलमय पदार्थ भी 'समुद्र' ऐसा कहकर ही पुकारा जाता है ।<br><br>इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त परिद्रष्टा अर्थात् जिस प्रकार सूर्य सब ओर अपने स्वरूपभूत प्रकाशका कर्ता है उसी प्रकार परि—सब ओर द्रष्टा—दर्शनके कर्ता स्वरूपभूत इस प्रकृत (जिसका प्रकरण चल रहा है) पुरुषकी ये प्राण आदि उपर्युक्त सोलह कलाएँ, जिनका अयन—आत्मभावकी प्राप्तिका स्थान वह पुरुष ही है जैसा कि नदियोंका समुद्र, अतः जो पुरुषायण कहलाती हैं, उस पुरुषको प्राप्त होकर—पुरुषरूपसे स्थित होकर उसी प्रकार [जैसे कि समुद्रमें नदियाँ] लीन हो जाती हैं। तथा इन कलाओंके प्राणादिसंज्ञक नाम और अपने-अपने विभिन्न रूप नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार नाम-रूपका नाश हो जानेपर भी जिसका नाश नहीं होता उस तत्त्वको ब्रह्मवेत्ता 'पुरुष' ऐसा कहकर पुकारते हैं। |
| ११४ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| य एवं विद्वान्गुरुणा प्रदर्शितकलाप्रलयमार्गः स एष विद्यया प्रविलापितास्वविद्याकामकर्मजनितासु प्राणादिकलास्वकलः, अविद्याकृतकलानिमित्तो हि मृत्युस्तदपगमेऽकलत्वादेवामृतो भवति तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोकः ॥ ५ ॥ | इस प्रकार जिसे गुरुने कलाओंके प्रलयका मार्ग दिखलाया है ऐसा जो पुरुष इस तत्त्वको जाननेवाला है, वह उस विद्याके द्वारा अविद्या, काम और कर्मजनित प्राणादि कलाओंके लोप कर दिये जानेपर निष्कल हो जाता है, और क्योंकि मृत्यु भी अविद्याकृत कलाओंके कारण ही होती है इसलिये उनकी निवृत्ति हो जानेपर वह निष्कल हो जानेके कारण अमर हो जाता है। इसी सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है—॥ ५ ॥ |
मरण-दुःखकी निवृत्तिमें परमात्मज्ञानका उपयोग
अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः ।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥
जिसमें रथकी नाभिमें अरोंके समान सब कलाएँ आश्रित हैं उस ज्ञातव्य पुरुषको तुम जानो, जिससे कि मृत्यु तुम्हें कष्ट न पहुँचा सके ॥ ६ ॥
| अरा रथचक्रपरिवारा इव रथनाभौ रथचक्रस्य नाभौ यथा प्रवेशितास्तदाश्रया भवन्ति यथा तथेत्यर्थः; कलाः प्राणाद्या यस्मिन्पुरुषे प्रतिष्ठिता उत्पत्तिस्थितिलयकालेषु | रथके पहियेके परिवाररूप अरोंके समान—अर्थात् जिस प्रकार वे रथके पहियेकी नाभिमें प्रविष्ट यानी उसके आश्रित रहते हैं उसी प्रकार जिस पुरुषमें प्राणादि कलाएँ अपनी उत्पत्ति, स्थिति और लयके समय स्थित रहती हैं, कलाओंके |
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
| तं पुरुषं कलानामात्मभूतं वेद्यं वेदनीयं पूर्णत्वात् पुरुषं पुरि शयनाद्वा वेद जानीयात्; यथा हे शिष्या मा वो युष्मान्मृत्युः परिव्यथा मा परिव्यथयतु । न चेद्विज्ञायेत पुरुषो मृत्युनिमित्तां व्यथामापन्ना दुःखिन एव यूयं स्थ । अतस्तन्मा भूद्युष्माकमित्यभिप्रायः ॥ ६ ॥ | आत्मभूत उस ज्ञातव्य पुरुषको, जो सर्वत्र पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष कहलाता है, जानो; जिससे कि हे शिष्यो ! तुम्हें मृत्यु सब ओरसे व्यथित न करें । यदि तुमने उस पुरुषको न जाना तो तुम मृत्युनिमित्तक व्यथाको प्राप्त होकर दुःखी ही होगे । अतः तुम्हें वह दुःख प्राप्त न हो, यही इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥ |
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उपदेशका उपसंहार
तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥
तब उनसे उस (पिप्पलाद मुनि) ने कहा—'इस परब्रह्मको मैं इतना ही जानता हूँ । इससे अन्य और कुछ [ ज्ञातव्य ] नहीं है ॥७॥
| तानेवमनुशिष्य शिष्यांस्तान् होवाच पिप्पलादः किलैतावदेव वेद्यं परं ब्रह्म वेद विजानाम्यहमेतत् । नातोऽस्मात्परमस्ति प्रकृष्टतरं वेदितव्यमित्येवमुक्तवाञ्छिष्याणामविदितशेषास्तित्वाशङ्कानिवृत्तये कृतार्थबुद्धिजननार्थं च ॥ ७ ॥ | उन शिष्योंको इस प्रकार शिक्षा दे पिप्पलाद मुनिने उनसे कहा—'उस वेद्य (ज्ञातव्य) परब्रह्मको मैं इतना ही जानता हूँ । इससे पर-उत्कृष्टतर और कोई वेद्य नहीं है । इस प्रकार 'अभी कुछ बिना जाना रह गया' ऐसी शिष्योंकी आशंकाकी निवृत्तिके लिये तथा उनमें कृतार्थबुद्धि उत्पन्न करनेके लिये पिप्पलादने उनसे कहा ॥७॥ |
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११६ · प्रश्नोपनिषद् · [ प्रश्न ६
स्तुतिपूर्वक आचार्यकी वन्दना
ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥
तब उन्होंने उनकी पूजा करते हुए कहा—'आप तो हमारे पिता हैं, जिन्होंने कि हमें अविद्याके दूसरे पारपर पहुँचा दिया है; आप परमर्षिको हमारा नमस्कार हो, नमस्कार हो ॥ ८ ॥
| ततस्ते शिष्या गुरुणानु- | तब गुरुसे उपदेश पाये हुए |
| शिष्टास्तं गुरुं कृतार्थाः सन्तो | उन शिष्यों ने कृतार्थ हो, उस |
| विद्यानिष्क्रयमपश्यन्तः किं | विद्यादानका कोई अन्य प्रतिकार |
| कृतवन्त इत्युच्यते—अर्चयन्तः | न देखकर क्या किया सो बतलाते |
| पूजयन्तः पादयोः पुष्पाञ्जलि- | हैं—उन्होंने गुरुजीका अर्चन |
| प्रकिरणेन प्रणिपातेन च | अर्थात् चरणोंमें पुष्पाञ्जलिप्रदान |
| शिरसा । किमृचुरित्याह—त्वं हि | एवं शिर झुकाकर प्रणाम करके |
| नोऽस्माकं पिता ब्रह्मशरीरस्य | उनका पूजन करते हुए [कहा] । |
| विद्यया जनयितृत्वान्नित्यस्या- | क्या कहा, सो बतलाते हैं— |
| जरामरस्याभयस्य । यस्त्वमेव | 'विद्याके द्वारा हमारे नित्य, |
| अस्माकमविद्याया विपरीतज्ञानात् | अजर, अमर एवं अभयरूप ब्रह्म- |
| जन्मजरामरणरोगदुःखादिग्रा- | शरीरके जनयिता होनेके कारण |
| हादपारादविद्यामहोदधेर्विद्या- | आप तो हमारे पिता हैं; जिन |
| प्लवेन परमपुनरावृत्तिलक्षणं | आपने विद्यारूप नौकाके द्वारा |
| हमें विपरीत ज्ञानरूप अविद्यासे | |
| अर्थात् जन्म, जरा, मरण, रोग | |
| और दुःख आदि ग्राहोंके कारण | |
| जो अपार है उस अविद्यारूप | |
| समुद्रसे उस ओर महासागरके |
मन्त्रप्रतीक-सूची (परिशिष्ट)
प्रश्न ६ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ११७
| मोक्षाख्यं महोदधेरिव पारं तार- | परपारके समान अपुनरावृत्तिरूप |
|---|---|
| यस्यस्मानित्यतः पितृत्वं तवास्मान् | मोक्षसंज्ञक दूसरे पारपर पहुँचा |
| प्रत्युपपन्नमितरस्मात् । इतरोऽपि | दिया है; अतः आपका पितृत्व तो |
| हि पिता शरीरमात्रं जनयति । | अन्य ( जन्मदाता ) पिताकी अपेक्षा |
| तथापि स प्रपूज्यतमो लोके | भी युक्ततर है; क्योंकि दूसरा |
| किमु वक्तव्यमात्यन्तिकाभय- | पिता भी केवल शरीरको ही उत्पन्न |
| दातुरित्यभिप्रायः । नमः परम- | करता है, तो भी वह लोकमें सबसे |
| ऋषिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृ- | अधिक पूजनीय होता है; फिर |
| भ्यो नमः परमऋषिभ्य इति | आत्यन्तिक अभयप्रदान करनेवाले |
| द्विर्वचनमादरार्थम् ॥८॥ | आपके पूजनीयत्वके विषयमें तो |
| कहना ही क्या है ? अतः ब्रह्मविद्या- | |
| सम्प्रदायके प्रवर्तक परमर्षिको | |
| नमस्कार हो । यहाँ 'नमः परम- | |
| ऋषिभ्यः' इसकी द्विरुक्ति आदर- | |
| प्रदर्शनके लिये है ॥८॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपाद-
शिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
षष्ठः प्रश्नः ॥ ६ ॥
इत्यथर्ववेदीया प्रश्नोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
शान्तिपाठः
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभि-
र्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्ताक्ष्र्योऽरिष्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
श्रीहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | प्र० | मं० | पृ० | |
|---|---|---|---|---|
| अत्रैष देवः स्वप्ने | ... | ४ | ५ | ५८ |
| अथ कबन्धी कात्यायनः | ... | १ | ३ | ५ |
| अथ यदि द्विमात्रेण | ... | ५ | ४ | ७७ |
| अथ हैन कौसल्यः | ... | ३ | १ | ३५ |
| अथ हैन भार्गवः | ... | २ | १ | २३ |
| अथ हैनं शैव्यः | ... | १ | ५ | ७३ |
| अथ हैनं सुकेशा | ... | ६ | १ | ८५ |
| अथ हैनं सौर्यायणी | ... | ४ | १ | ४९ |
| अथादित्य उदयन | ... | १ | ६ | ८ |
| अथैकयोर्ध्व उदानः | ... | ३ | ७ | ४२ |
| अथोत्तरेण तपसा | ... | १ | १० | १४ |
| अन्नं वै प्रजापतिः | ... | १ | १४ | १९ |
| अरा इव रथनाभौ | ... | २ | ६ | २८ |
| ” ” ” | ... | ६ | ६ | ११४ |
| अहोरात्रो वै प्रजापतिः | ... | १ | १३ | १८ |
| आत्मन एष प्राणः | ... | ३ | ३ | ३७ |
| आदित्यो ह वै प्राणः | ... | १ | ५ | ७ |
| आदित्यो ह वै बाह्यः | ... | ३ | ८ | ४३ |
| इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा | ... | २ | ९ | ३१ |
| उत्पत्तिमायतिम् | ... | ३ | १२ | ४७ |
| ॐ सुकेशा च भारद्वाजः | ... | १ | १ | २ |
| ऋग्भिरेतं यजुर्भिः | ... | ५ | ७ | ८३ |
( २ )
| मन्त्रप्रतीकानि | प्र० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|
| एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा | ९ | ४ | ६९ |
| एषोऽग्निस्तपति | २ | ५ | २७ |
| तद्ये ह वै तत् | १ | १५ | २० |
| तस्मै स होवाच | १ | ४ | ६ |
| ,, ,, ,, | ... २ | २ | २४ |
| ,, ,, ,, | ... ३ | २ | ३६ |
| ,, ,, ,, | ... ४ | २ | ५२ |
| ,, ,, ,, | ... २ | ५ | ७४ |
| ,, ,, ,, | ... ६ | २ | ८८ |
| तान्वरिष्ठः प्राणः | ... २ | ३ | २५ |
| तान्ह स ऋषिः | ... १ | २ | ४ |
| तान्होवाचैतावत् | ... ६ | ७ | ११५ |
| तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः | ... ५ | ६ | ८१ |
| तेजो ह वा उदानः | ... ३ | ९ | ४४ |
| ते तमर्चयन्तः | ... ६ | ८ | ११६ |
| तेषामसौ विरजः | ... १ | १६ | २१ |
| देवानामसि वह्नितमः | ... २ | ८ | ३० |
| पञ्चपादं पितरम् | ... १ | ११ | १५ |
| परमेवाक्षरम् | ... ४ | १० | ७० |
| पृथिवी च पृथिवीमात्रा | ... ४ | ८ | ६७ |
| पायूपस्थेऽपानम् | ... ३ | ५ | ३९ |
| प्रजापतिश्चरसि | ... २ | ७ | २९ |
| प्राणस्येदं वशे | ... २ | १३ | ३४ |
| प्राणाग्नय एवैतस्मिन् | ... ४ | ३ | ५४ |
| मासो वै प्रजापतिः | ... १ | १२ | १७ |
| य एवं विद्वान्प्राणम् | ... ३ | ११ | ४६ |
( ३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | प्र० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|
| यच्चित्तस्तेनैष प्राणम् | ३ | १० | ४५ |
| यथा सम्राडेव | ३ | ४ | ३८ |
| यदा त्वमभिवर्षसि | २ | १० | ३१ |
| यदुच्छ्वासनिःश्वासौ | ४ | ४ | ५६ |
| यः पुनरेतं त्रिमात्रेण | ५ | ५ | ७८ |
| या ते तनूर्वाचि | २ | १२ | ३३ |
| विज्ञानात्मा सह | ४ | ११ | ७१ |
| विश्वरूपं हरिणम् | १ | ८ | १० |
| व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिंरत्ता | २ | ११ | ३२ |
| स ईक्षांचक्रे | ६ | ३ | ९९ |
| स एष वैश्वानरः | १ | ७ | १० |
| स प्राणमसृजत | ६ | ४ | १०९ |
| स यथेमा नद्यः | ६ | ५ | ११२ |
| स यदा तेजसा | ४ | ६ | ६५ |
| स यदा सोभ्य | ४ | ७ | ६६ |
| स यद्येकमात्रम् | ५ | ३ | ७६ |
| संवत्सरो वै प्रजापतिः | १ | ९ | ११ |
| सोऽभिमानादूर्ध्वम् | २ | ४ | २६ |
| हृदि ह्येष आत्मा | ३ | ६ | ४० |