प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
| तं पुरुषं कलानामात्मभूतं वेद्यं वेदनीयं पूर्णत्वात् पुरुषं पुरि शयनाद्वा वेद जानीयात्; यथा हे शिष्या मा वो युष्मान्मृत्युः परिव्यथा मा परिव्यथयतु । न चेद्विज्ञायेत पुरुषो मृत्युनिमित्तां व्यथामापन्ना दुःखिन एव यूयं स्थ । अतस्तन्मा भूद्युष्माकमित्यभिप्रायः ॥ ६ ॥ | आत्मभूत उस ज्ञातव्य पुरुषको, जो सर्वत्र पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष कहलाता है, जानो; जिससे कि हे शिष्यो ! तुम्हें मृत्यु सब ओरसे व्यथित न करें । यदि तुमने उस पुरुषको न जाना तो तुम मृत्युनिमित्तक व्यथाको प्राप्त होकर दुःखी ही होगे । अतः तुम्हें वह दुःख प्राप्त न हो, यही इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥ |
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उपदेशका उपसंहार
तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥
तब उनसे उस (पिप्पलाद मुनि) ने कहा—'इस परब्रह्मको मैं इतना ही जानता हूँ । इससे अन्य और कुछ [ ज्ञातव्य ] नहीं है ॥७॥
| तानेवमनुशिष्य शिष्यांस्तान् होवाच पिप्पलादः किलैतावदेव वेद्यं परं ब्रह्म वेद विजानाम्यहमेतत् । नातोऽस्मात्परमस्ति प्रकृष्टतरं वेदितव्यमित्येवमुक्तवाञ्छिष्याणामविदितशेषास्तित्वाशङ्कानिवृत्तये कृतार्थबुद्धिजननार्थं च ॥ ७ ॥ | उन शिष्योंको इस प्रकार शिक्षा दे पिप्पलाद मुनिने उनसे कहा—'उस वेद्य (ज्ञातव्य) परब्रह्मको मैं इतना ही जानता हूँ । इससे पर-उत्कृष्टतर और कोई वेद्य नहीं है । इस प्रकार 'अभी कुछ बिना जाना रह गया' ऐसी शिष्योंकी आशंकाकी निवृत्तिके लिये तथा उनमें कृतार्थबुद्धि उत्पन्न करनेके लिये पिप्पलादने उनसे कहा ॥७॥ |
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११६ · प्रश्नोपनिषद् · [ प्रश्न ६
स्तुतिपूर्वक आचार्यकी वन्दना
ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥
तब उन्होंने उनकी पूजा करते हुए कहा—'आप तो हमारे पिता हैं, जिन्होंने कि हमें अविद्याके दूसरे पारपर पहुँचा दिया है; आप परमर्षिको हमारा नमस्कार हो, नमस्कार हो ॥ ८ ॥
| ततस्ते शिष्या गुरुणानु- | तब गुरुसे उपदेश पाये हुए |
| शिष्टास्तं गुरुं कृतार्थाः सन्तो | उन शिष्यों ने कृतार्थ हो, उस |
| विद्यानिष्क्रयमपश्यन्तः किं | विद्यादानका कोई अन्य प्रतिकार |
| कृतवन्त इत्युच्यते—अर्चयन्तः | न देखकर क्या किया सो बतलाते |
| पूजयन्तः पादयोः पुष्पाञ्जलि- | हैं—उन्होंने गुरुजीका अर्चन |
| प्रकिरणेन प्रणिपातेन च | अर्थात् चरणोंमें पुष्पाञ्जलिप्रदान |
| शिरसा । किमृचुरित्याह—त्वं हि | एवं शिर झुकाकर प्रणाम करके |
| नोऽस्माकं पिता ब्रह्मशरीरस्य | उनका पूजन करते हुए [कहा] । |
| विद्यया जनयितृत्वान्नित्यस्या- | क्या कहा, सो बतलाते हैं— |
| जरामरस्याभयस्य । यस्त्वमेव | 'विद्याके द्वारा हमारे नित्य, |
| अस्माकमविद्याया विपरीतज्ञानात् | अजर, अमर एवं अभयरूप ब्रह्म- |
| जन्मजरामरणरोगदुःखादिग्रा- | शरीरके जनयिता होनेके कारण |
| हादपारादविद्यामहोदधेर्विद्या- | आप तो हमारे पिता हैं; जिन |
| प्लवेन परमपुनरावृत्तिलक्षणं | आपने विद्यारूप नौकाके द्वारा |
| हमें विपरीत ज्ञानरूप अविद्यासे | |
| अर्थात् जन्म, जरा, मरण, रोग | |
| और दुःख आदि ग्राहोंके कारण | |
| जो अपार है उस अविद्यारूप | |
| समुद्रसे उस ओर महासागरके |
मन्त्रप्रतीक-सूची (परिशिष्ट)
प्रश्न ६ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ११७
| मोक्षाख्यं महोदधेरिव पारं तार- | परपारके समान अपुनरावृत्तिरूप |
|---|---|
| यस्यस्मानित्यतः पितृत्वं तवास्मान् | मोक्षसंज्ञक दूसरे पारपर पहुँचा |
| प्रत्युपपन्नमितरस्मात् । इतरोऽपि | दिया है; अतः आपका पितृत्व तो |
| हि पिता शरीरमात्रं जनयति । | अन्य ( जन्मदाता ) पिताकी अपेक्षा |
| तथापि स प्रपूज्यतमो लोके | भी युक्ततर है; क्योंकि दूसरा |
| किमु वक्तव्यमात्यन्तिकाभय- | पिता भी केवल शरीरको ही उत्पन्न |
| दातुरित्यभिप्रायः । नमः परम- | करता है, तो भी वह लोकमें सबसे |
| ऋषिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृ- | अधिक पूजनीय होता है; फिर |
| भ्यो नमः परमऋषिभ्य इति | आत्यन्तिक अभयप्रदान करनेवाले |
| द्विर्वचनमादरार्थम् ॥८॥ | आपके पूजनीयत्वके विषयमें तो |
| कहना ही क्या है ? अतः ब्रह्मविद्या- | |
| सम्प्रदायके प्रवर्तक परमर्षिको | |
| नमस्कार हो । यहाँ 'नमः परम- | |
| ऋषिभ्यः' इसकी द्विरुक्ति आदर- | |
| प्रदर्शनके लिये है ॥८॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपाद-
शिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
षष्ठः प्रश्नः ॥ ६ ॥
इत्यथर्ववेदीया प्रश्नोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
शान्तिपाठः
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभि-
र्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्ताक्ष्र्योऽरिष्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
श्रीहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | प्र० | मं० | पृ० | |
|---|---|---|---|---|
| अत्रैष देवः स्वप्ने | ... | ४ | ५ | ५८ |
| अथ कबन्धी कात्यायनः | ... | १ | ३ | ५ |
| अथ यदि द्विमात्रेण | ... | ५ | ४ | ७७ |
| अथ हैन कौसल्यः | ... | ३ | १ | ३५ |
| अथ हैन भार्गवः | ... | २ | १ | २३ |
| अथ हैनं शैव्यः | ... | १ | ५ | ७३ |
| अथ हैनं सुकेशा | ... | ६ | १ | ८५ |
| अथ हैनं सौर्यायणी | ... | ४ | १ | ४९ |
| अथादित्य उदयन | ... | १ | ६ | ८ |
| अथैकयोर्ध्व उदानः | ... | ३ | ७ | ४२ |
| अथोत्तरेण तपसा | ... | १ | १० | १४ |
| अन्नं वै प्रजापतिः | ... | १ | १४ | १९ |
| अरा इव रथनाभौ | ... | २ | ६ | २८ |
| ” ” ” | ... | ६ | ६ | ११४ |
| अहोरात्रो वै प्रजापतिः | ... | १ | १३ | १८ |
| आत्मन एष प्राणः | ... | ३ | ३ | ३७ |
| आदित्यो ह वै प्राणः | ... | १ | ५ | ७ |
| आदित्यो ह वै बाह्यः | ... | ३ | ८ | ४३ |
| इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा | ... | २ | ९ | ३१ |
| उत्पत्तिमायतिम् | ... | ३ | १२ | ४७ |
| ॐ सुकेशा च भारद्वाजः | ... | १ | १ | २ |
| ऋग्भिरेतं यजुर्भिः | ... | ५ | ७ | ८३ |
( २ )
| मन्त्रप्रतीकानि | प्र० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|
| एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा | ९ | ४ | ६९ |
| एषोऽग्निस्तपति | २ | ५ | २७ |
| तद्ये ह वै तत् | १ | १५ | २० |
| तस्मै स होवाच | १ | ४ | ६ |
| ,, ,, ,, | ... २ | २ | २४ |
| ,, ,, ,, | ... ३ | २ | ३६ |
| ,, ,, ,, | ... ४ | २ | ५२ |
| ,, ,, ,, | ... २ | ५ | ७४ |
| ,, ,, ,, | ... ६ | २ | ८८ |
| तान्वरिष्ठः प्राणः | ... २ | ३ | २५ |
| तान्ह स ऋषिः | ... १ | २ | ४ |
| तान्होवाचैतावत् | ... ६ | ७ | ११५ |
| तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः | ... ५ | ६ | ८१ |
| तेजो ह वा उदानः | ... ३ | ९ | ४४ |
| ते तमर्चयन्तः | ... ६ | ८ | ११६ |
| तेषामसौ विरजः | ... १ | १६ | २१ |
| देवानामसि वह्नितमः | ... २ | ८ | ३० |
| पञ्चपादं पितरम् | ... १ | ११ | १५ |
| परमेवाक्षरम् | ... ४ | १० | ७० |
| पृथिवी च पृथिवीमात्रा | ... ४ | ८ | ६७ |
| पायूपस्थेऽपानम् | ... ३ | ५ | ३९ |
| प्रजापतिश्चरसि | ... २ | ७ | २९ |
| प्राणस्येदं वशे | ... २ | १३ | ३४ |
| प्राणाग्नय एवैतस्मिन् | ... ४ | ३ | ५४ |
| मासो वै प्रजापतिः | ... १ | १२ | १७ |
| य एवं विद्वान्प्राणम् | ... ३ | ११ | ४६ |
( ३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | प्र० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|
| यच्चित्तस्तेनैष प्राणम् | ३ | १० | ४५ |
| यथा सम्राडेव | ३ | ४ | ३८ |
| यदा त्वमभिवर्षसि | २ | १० | ३१ |
| यदुच्छ्वासनिःश्वासौ | ४ | ४ | ५६ |
| यः पुनरेतं त्रिमात्रेण | ५ | ५ | ७८ |
| या ते तनूर्वाचि | २ | १२ | ३३ |
| विज्ञानात्मा सह | ४ | ११ | ७१ |
| विश्वरूपं हरिणम् | १ | ८ | १० |
| व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिंरत्ता | २ | ११ | ३२ |
| स ईक्षांचक्रे | ६ | ३ | ९९ |
| स एष वैश्वानरः | १ | ७ | १० |
| स प्राणमसृजत | ६ | ४ | १०९ |
| स यथेमा नद्यः | ६ | ५ | ११२ |
| स यदा तेजसा | ४ | ६ | ६५ |
| स यदा सोभ्य | ४ | ७ | ६६ |
| स यद्येकमात्रम् | ५ | ३ | ७६ |
| संवत्सरो वै प्रजापतिः | १ | ९ | ११ |
| सोऽभिमानादूर्ध्वम् | २ | ४ | २६ |
| हृदि ह्येष आत्मा | ३ | ६ | ४० |