प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 100 ) भरत—प्रशंसनीय पश्चात्ताप करने वाले को नमस्कार है । (दशरथ की प्र को देखते हुए श्रौर घबरा कर) श्ररे, मेरा हृदय इन महापुरु गौरवचिन्ता मे लग गया था, इसलिए ठीक से नही समझ सका । श्राप फिर से बताइये कि ये कौन हैं ? देवकुलिक—ये दिलीप हैं । भरत—महाराज के प्रपितामह । इसके वाद । देवकुलिक—ये हैं रघु । भरत—महाराज के पितामह । इसके आगे । देवकुलिक—ये श्रीमान् अज हैं । भरत—महाराज के पिता । क्या कहा, क्या कहा ? देवकुलिक—यह दिलीप, यह रघु, यह अज हैं । भरत—मैं श्रापसे कुछ पूछना चाहता हूँ । क्या जीवितों की भी प्रति स्थापित की जाती हैं ? देवकुलिक—नही, केवल मृतको की । भरत—अच्छा, श्रव श्राप मुझे जाने की श्राज्ञा दें । देवकुलिक—ठहरो, जिन्होने स्त्री शुल्क के लिए अपने राज्य श्रौर प्राण सव कुछ दिए, उन महाराज दशरथ की प्रतिमा के विषय मे श्राप क्यों नही जानना चाहते । (८) भरत—हा पिताजी । (वेहोश होकर गिरता है । फिर होश मे श्राकर) हे हृदय, श्रव तुम्हारी इच्छा पूरी हुई, जिसकी तुम्हे श्राशंका थी, पिता की मृत्यु के समाचार को सुनो श्रौर धीरज बाँधो । किन्तु हा यदि स्त्री शुल्क मे याचित राज्य का उद्देश्य मैं बनाया गया होऊँ तब तो देह की शुद्धि करनी पडेगी श्रर्थात् कड़ी परीक्षा देकर श्रप निर्दोष होना सिद्ध करना पडेगा । (६) श्रार्य ! देवकुलिक—'श्रार्य, कह कर वात करना तो इक्ष्वाकु वंशी लोगों का क्रम है क्या श्राप कैकयी के पुत्र भरत तो नही है ?