भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

( 105 ) देवकुलिक—(देख कर) अरे, पुत्र के संज्ञाहीन होने पर माताएं आ गईं, यह बडा अच्छा हुआ। क्योकि पुत्र के लिए माता का हस्तस्पर्श प्यासे के लिए जलधारा के समान हुआ करता है। (१२) (इसके बाद रानियो व सुमन्त्र का प्रवेश) सुमन्त्र—देविया, आप इधर से आयें। जो ऊँचाई में राजमहलो से भी बड़ा है, ऐसा यह हमारा प्रतिमा रूप से अवस्थित महाराज का सदन है। यहां यात्री लोग स्वतन्त्रतापूर्वक, पहरेदारों की बिना रोक-टोक के आते-जाते है तथा बिना प्रणाम के उपासना करते है (१३) (प्रवेश करके और देखकर) हे देवियों, आप अन्दर मत आइए, मत आइए। यहा कोई कुमार गिर पडा है, ऐसा लगता है मानो राजा दशरथ का युवावस्था का शरीर हो। देवकुलिक—आप किसी दूसरे की आशंका मत कीजिए। ये भरत है। आप इन्हे सम्भालिए। (१४) (निकल जाता है) रानियां—(शीघ्रता से पास जाकर) हा पुत्र, भरत। भरत—(कुछ होश मे आकर) आर्य। सुमन्त्र—जय हो महा—(इस प्रकार आधा कहकर, दुःख पूर्वक) अहा, बोली में कितनी समानता है। लगता है जैसे दशरथ की प्रतिमा ही बोल रही हो। भरत—तो फिर माताओं की अब क्या दशा है? रानियां—हे पुत्र, हमारी दशा यह है। (घूंघट हटाती हैं) सुमन्त्र—देवियो, अपने आवेग को रोके। भरत—(सुमन्त्र को देख कर) सभी प्रकार के व्यवहार में आपकी उपस्थिति से मुझे जान पड़ता है कि आप सुमन्त्र हैं।