प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०४ ) अन्वय—पुत्रे मोहम् उपागते देव्यःकाले आगताः खलु, मातृणां हस्त- स्पर्शः हि अजलस्य जलाञ्जलिः । (१२) अन्वय- - यस्य स हर्म्यदुर्लभः समुच्छ्रयः तत् इदं नः प्रतिमानृपस्य गृहम्, अनन्वितैः अप्रतिहारिकागतैः पथिकैः प्रणामं विना उपास्यते । (१३) अन्वय—हि अय कः अपि वयःस्थः पार्थिवः इव पतितः । पर्यङ्ककामं कर्तुम् अलम्, हि अयम् भरतः, गृह्यताम् । (१४) अन्वय--चिरजीवदोषैः अन्वास्यमानः, कृतघ्नभावेन विडम्ब्यमानः अहं. हि तस्मिन् नृपतौ विपन्ने शून्यस्य रथस्य सूतः जीवामि । (१५) हिन्दी अर्थ देवकुलिक—कुमार, धैर्य रखो, धैर्य रखो । भरत—(होश में आकर) पिताजी और बड़े भाई राम से शून्य वन के समान इस अयोध्या में मैं जा रहा हूं । जैसे कोई प्यासा आदमी सूखी नदी की ओर दौड़ता जा रहा हो । (१०) आर्य, विस्तारपूर्वक सुनने से मेरे मन को कुछ सहारा मिल रहा है, अतः समूचे वृत्तान्त को पूरी तरह से कहो । देवकुलिक—सुनिए, जब महाराज दशरथ राजकुमार राम का अभिषेक कर रहे थे उस समय आपकी माता कैकेयी ने कहा । भरत—ठहरो, उस अनर्थकारी विवाह शुल्क को याद कर उसने कहा होगा कि मेरा पुत्र राजा बने । इस प्रार्थना के सफल हो जाने से उसका बल बढ़ा होगा और फिर उसने कहा होगा कि राम वन को जाएँ । राम को वल्कल वस्त्र पहने देख कर महाराज को असामयिक मृत्यु प्राप्त हो गई होगी । इन सब बातों से दुःखी प्रजावर्ग इन सबका मूल मुझे मानकर धिक्कारती होगी और उसका धिक्कारना उचित भी है । (११) (मूर्च्छित हो जाता है) (नेपथ्य में) हट जाइए, हट जाइए ।