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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 178 में से

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पृष्ठ 106

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सुनता। स्थैर्यम्=स्थिरता को। अनवशेषम्=सम्पूर्ण रूप से। अभिधीयताम्= कहा जाए। अभिषिच्यमाने=राज्य की धुरी पर नियोजित करते हुए। शुल्क- दोष=विवाह के मूल्य रूपी अनर्थ को। स्मृत्वा=याद करके। भवतु=होवे। मम सुतः=मेरा पुत्र भरत। अभिहितं=कहा। धैर्येण=धैर्यपूर्वक। आश्वसत्या= साहस प्राप्त होने पर। व्रज = जाओ। सुत=हे पुत्र राम। बद्धचीर=वल्कल वस्त्र पहने हुए को। निधनम्=मृत्यु को। असदृशं=आरोग्य अर्थात् बिना अवसर के। पात्यन्ते = गिराए जा रहे हैं। धिक्प्रलापाः=धिक्कार के वाक्य। ननु= सचमुच मे। मयि=मुझ पर। सदृशाः= समुचित। शेषाः= जननी कैकेयी की भर्त्सना से बचे हुए। प्रकृतिभिः=प्रजाजनों के द्वारा। मोहम् उपगतः=संज्ञाहीन हो जाता है। उत्सरत=हटो। आर्याः=सज्जनो। काले=उचित समय पर। देव्यः= कौशल्या आदि रानियां। उपागते=प्राप्त होने पर। अजलस्य=जलरहित प्यासे व्यक्ति के लिए। जलाञ्जलिः=जल की अंजलि। इतः इतः=इधर से आइए इधर से। भवत्यः=आप देवियां। प्रतिमानृपस्य=प्रतिमा रूप से बने राजाओं का नः=हमारे। समुच्छ्रयः= उन्नत। हर्म्यदुर्लभः=राज सदन से भी बढ़कर। अयन्त्रितैः=बिना रोके जाने वाले। अप्रतिहारिकागतैः=द्वारपाल की अनुमति के बिना आने वाले। विना प्रणामं=प्रणाम रहित। पथिकैः=मुसाफिरों द्वारा। उपास्यते=उपयोग में लिया जाता है। वयःस्थः=युवा। इव=समान। पार्थिवः= राजा = दशरथ। परशङ्काम्=किसी पराए की आशंका को। अलं कर्तुम्= मत करो। गृह्यताम्=ग्रहण करो। अन्वास्यमानः=पीछा किए जाते हुए। चिरजीवदोषैः=दीर्घजीवी पुरुष मे आसानी से प्राप्त होने वाले दूषणों के द्वारा। कृतघ्नभावेन=किए हुए के उपकार को न मानने की भावना के द्वारा। विडम्ब्यमानः=हँसी उड़ाया गया। विपन्ने=मर जाने पर। जीवामि=जी रहा हूँ। सूतः=सारथि। अन्वय-पित्रा भ्रात्रा च वर्जिताम् अटवीभूताम् अयोध्याम् क्षीणतोयाम् नदीम् इव पिपासार्तः अनुधावामि। (१०) अन्वय—तं शुल्कदोषं स्मृत्वा मम सुतः राजा भवतु इति तया अभि- हितम्। तत् धैर्येण आश्वसन्त्या सुतं वनं व्रज इति आर्यः अपि अभिहितः। तं बद्धचीरं दृष्ट्वा राजा असदृशं निधनं गतः ननु, प्रकृतिभिः शेषाः सदृशाः धिक् प्रलापाः ननु मयि पात्यन्ते। (११)

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