प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 127 ) बहुत समय तक । जीव = जीवित रहो । पूरय = सफल करो । पश्चात् = बाद मे। प्रवेक्ष्यामि = प्रवेश करूँगा । याते = चले जाने पर । विदितार्थस्य = वृत्तान्त को जानने वाले । पूर्वदर्शनम् = प्रथम बार मिलना । स्वस्ति = कल्याण हो । प्रसारय = फैलाओ । कवाटपुटप्रमाणम् = किवाड़ो के समान विस्तीर्ण । आलिङ्ग = भेंट करो । सुविपुलेन = खूब लम्बे । भुजद्वयेन = दोनों हाथो से । उन्नामय = ऊँचा उठाओ । आननम् = मुख को । शरदिन्दुकल्पम् = शरत्काल के चन्द्रमा के समान । प्रह्लादय = शीतल बनाओ । व्यसनदग्धम् = दुख से जले हुए । अन्वय— इयं तुषारोत्पलपत्रनेत्रा आसारम् इव हर्षास्रम् उत्सृजन्ती तनये भावं निवेश्य माता इव स्वयं मानहेतोः गच्छतु । (१३) अन्वय—हलात् क्षेत्रोदरात् जातम् इद तत् स्त्रीमयं तेजः नृपेन्द्रस्य जनकस्य तपसः सन्निदर्शनम् । (१४) अन्वय—अहम् पश्चात् प्रवेक्ष्यामि, नराधिपे स्वर्गम् याते विदितार्थस्य- रामस्य मम एतत् पूर्वदर्शनम् । (१५) अन्वय—कवाटपुटप्रमाण वक्षः प्रसारय । मां सुविपुलेन भुजद्वयेन आलिङ्ग इद । शरदिन्दुकल्पम् आननम् उन्नामय । इदं व्यसनदग्धं शरीरं प्रह्लादय । (१६) हिन्दी अर्थ राम—वत्स लक्ष्मण, क्या इसमें भी तुम मेरी अनुमति की आवश्यकता समझते हो । जाओ और जल्दी से भरत को सम्मानपूर्वक अन्दर ले आओ । लक्ष्मण—जैसी आपकी आज्ञा । राम—अथवा तुम रुक जाओ । यह सीता स्वयं जाए और माँ की तरह सस्नेह भरत का सत्कार करके उन्हे भीतर ले आए । यह सीता जो ओस की बूँदों से भरे नील कमल की तरह आंखो वाली है और जिन आँखों से स्वतः प्रेमाश्रु की धारा वर्षा की झड़ी की तरह वह रही है । (१३)