भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

( 128 ) सीता—जैसी पतिदेव की आज्ञा । (उठ कर, घूम कर और भरत को देख कर) अरे, मुझसे पहले ही भीतर से आर्यपुत्र बाहर कैसे आ गए ? नहीं, नहीं । यह तो केवल आकृति की समता है । सुमन्त्र—अरे, यह तो बहू है । भरतः—क्या, यह पूज्या जनक तनया सीता है ? यह वही दीप्तिमान् नारी रूप तेज है, जो खेत को जोतते समय पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था और जो राजर्षि जनक की तपस्या का ज्वलन्त उदाहरण है । (१४) आर्ये, मैं प्रणाम करता हूं । मैं भरत हूं । सीता—(अपने मन में) केवल आकृति ही नहीं, आवाज भी वैसी ही है । (प्रकट रूप में) वत्स, चिरजीवी बनो । भरत—कृतकृत्य हो गया । सीता—आओ वत्स, अपने भाई की इच्छा को पूरी करो । सुमन्त्रः—राजकुमार, आप जाइए । भरत—तात, इस समय आप क्या करेंगे ? सुमन्त्र—मैं बाद में आऊँगा क्योंकि महाराज की मृत्यु की सूचना जब से राम को मिली है, इसके बाद उनसे यह मेरी पहली भेंट है । (१५) भरत—ऐसा ही हो । (राम के पास जाकर) आर्य, मैं प्रणाम करता हूं । मैं भरत हूं । राम—(प्रसन्नता से) आओ, आओ, इक्ष्वाकु राजकुमार, कल्याण हो । तुम दीर्घ काल तक जीवित रहो । तुम किवाड़ की तरह अपनी चौड़ी छाती फैला कर अपनी विशाल- काय भुजाओं से मेरा आलिङ्गन करो । तुम शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान अपने आह्लादक मुख को ऊपर उठाओ तथा शोक की ज्वाला में जलते हुए मेरे हृदय को शीतल करो । (१६) भरत—मैं कृतकृत्य हुआ । (५) मूल सुमन्त्रः—(उपेत्य) जयत्वायुष्मान् । रामः—हा तात !