प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 135 ) अन्वय—भवता यत्सत्यम् परितोषितः अस्मि, भवान् निष्कल्मषात्मा, तैः भवतः गुणैः निर्जितः । त्वद् वाक्यस्य वशानुगः अस्मि । किन्तु एतत् तेः वचः तत् त्वया अनृतं कर्तुम् न युक्तम् । किञ्च भवद्विधम् उत्पाद्य ते ता मिथ्याभिधायी भवतु । (२३) अन्वय—यावत् भवन्नियमावसानं भविष्यति, नृप, तावत् इह ते पादमूले यम् । मैवम् नृपः स्वसुकृतैः सिद्धिम् अनुयातु, चेत् स्वराज्यं न परिरक्षसि, शपितः । (२४) अन्वय—मूर्ध्ना प्रणताय मे एते पादोपभुक्ते तव पादुके प्रयच्छ । यावत् भवान् कार्यसिद्धिम् एष्यति, तावत् अनयोः विधेयः भविष्यामि । (२५) हिन्दी अर्थ सीता—पतिदेव, भरत बहुत दीनता से बोल रहे हैं। आप अब क्या सोच रहे है ? राम—सीते, मैं स्वर्ग लोक मे गए हुए अपने उन पिताजी के विषय में सोच रहा हूँ, जिन्होने अपने अनुपम इस पुत्र रत्न को नही देखा। संसार में इस प्रकार के गुणसागर पुत्र को प्राप्त करके भी पिताजी की मृत्यु हो गई, तो भाग्य की इस विडम्बना को धिक्कार है। (२२) हे वत्स भरत, तुमने मुझे सचमुच मे प्रसन्न कर दिया। तुम्हारी अन्तरात्मा अति पवित्र है। तुम्हारी बात को मै मानता हूँ। तुम्हारे सुविख्यात गुणो ने मुझे जीत लिया है। ये सारी बाते ठीक है। किन्तु तुम्हारे द्वारा } पिताजी के इस वाक्य को कि "भरत राजा बने" मिथ्या करना समु- चित नहीं है। तुम्हारे जैसे इतने अच्छे पुत्र को उत्पन्न करके तुम्हारे पिता झूठ बोलने वाले हों, यह अच्छा नही है। (२३) भरत—हे महाराज राम, जब तक आपका यह वनवास समाप्त नहीं होगा, तब तक मैं भी यही आपके चरणो की सेवा में रहूँगा। राम—ऐसा मत कहो। राजा दशरथ को अपने पुण्य से सिद्धि भोगने दो। यदि तुम अपना राज्य नही सँभालो, तो तुम्हे मेरी शपथ है। (२४(