प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 136 ) भरत—हाय, आपने तो मुझे अनुत्तर सा कर दिया । अच्छा, मैं एक शर्त पर आपके राज्य का पालन करूँगा । राम—वत्स, वह कौन सी शर्त है । भरत—मेरे हाथ में धरोहर रखा हुआ आपका राज्य चौदह वर्ष के अन्त में पुनः आपको लौटाना चाहता हूँ । राम—ऐसा ही होवे । भरत—आर्य, सुना । हे पूज्ये, सुना । तात, सुना आपने । सभी—हम लोग साक्षी हैं । भरत—आर्य, मैं एक वरदान और लेना चाहता हूँ । राम—वत्स, क्या चाहते हो ? मैं क्या दूँ ? मैं क्या करूँ ? भरत—आपके चरणों में मस्तक झुकाने वाले मुझे आपके पाँवों में पहनी हुई ये खड़ाऊ दे दें । जब तक आप अपना वनवास पूरा करके लौटें तब तक मैं इनका सेवक बन कर आपका राज्य भार संभालूँगा । (२५) (७) मूल रामः—(स्वगतम्) हन्त भोः । सुचिरेणापि कालेन यशः किञ्चिन्मयार्जितम् । अचिरेणैव कालेन भरतेनाद्य सञ्चितम् ॥ (२६) सीता—आर्यपुत्र ! ननु दीयते खलु प्रथमयाचनं भरताय । रामः—तथास्तु । वत्स ! गृह्यताम् । भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । (गृहीत्वा) आर्य ! अत्राभिषेकोदकमावर्जयितुमिच्छामि । रामः—तात ! यदिष्टं भरतस्य तत् सर्वम् क्रियताम् । सुमन्त्रः—यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । भरतः— (आत्मगतम्) हन्त भोः! श्रद्धेयः स्वजनस्य पौररुचितो लोकस्य दृष्टिक्षमः स्वर्गस्थस्य नराधिपस्य दयितः गीfull/शीलान्वितोऽहं सुतः । भ्रातॄणां गुणशालिनां बहुमतः कीर्तेर्महद् भाजनं संवादेषु कथाश्रयो गणवतां लब्धप्रियाणां प्रियः ॥ (२७)