प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 139 ) प्रशंसा का बहुत बडा आश्रय, गुणीजनों की पारस्परिक वार्ता का विषय और सफल मनोरथ प्रजा का प्रिय बन गया हूँ । (२७) राम- हे वत्स भरत, राज्य की थोड़े समय के लिए भी उपेक्षा नही करनी चाहिए । अतः तुम आज ही विजय के लिए वापस लौट जाओ । सीता-अरे, क्या, आज ही कुमार भरत चले जायेगे । राम-अधिक स्नेह मत बताओ । आज ही भरत राज्य की रक्षा के निमित्त वापस जाये । भरत--आर्य, मै आज ही चला जाऊँगा । प्रजा के लोग आशा लगाए हुए आपको देखने की इच्छा से अयोध्या मे प्रतीक्षा कर रहे होगे । मैं जाकर उन्हे यह आपकी कृपा अर्थात् चरण पादुकाएँ दिखाऊँगा और उनको प्रसन्न करूँगा । (२८) सुमन्त्र-- हे दीर्घायु, अब मै क्या करूँ ? राम-तात, महाराज की भाँति भरत का पालन करे । सुमन्त्र-यदि जीवित रहा, तो प्रयास करूँगा ? राम-वत्स भरत, मेरे सामने ही रथ पर चढो । भरत-जो आज्ञा । (दोनो भरत और सुमन्त्र रथ पर बैठते हैं) राम-हे सीते, जरा इधर तो आओ । वत्स लक्ष्मण, तुम भी इधर आओ । आश्रम के द्वार तक हम भी भरत के पीछे चलेगे । (इस प्रकार सभी निकल जाते है) चौथा अंक समाप्त ।