प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकष्टं वनं स्त्रीजनसौकुमार्यं समं लताभिः कठिनीकरोति ॥ (३) (उपेत्य) मैथिलि ! अपि तपो वर्धते ! सीता—हम् आर्यपुत्रः ! जयत्वार्यपुत्रः । रामः—मैथिलि ! यदि ते नास्ति धर्मविघ्नः, आस्यताम् । सीता—यदार्यपुत्र आज्ञापयति । (उपविशति) रामः—मैथिलि ! प्रतिवचनार्थिनीमिव त्वां पश्यामि । किमिदम् ? सीता—शोकशून्यहृदयस्येवार्यपुत्रस्य मुखरागः । किमेतत् ? रामः—मैथिलि ! स्थाने खलु कृता चिन्ता । कृतान्तशल्याभिहते शरीरे तथैव तावद् हृदयव्रणो मे । नानाफलाः शोकशराभिघाता स्तत्रैव तत्रैव पुनः पतन्ति ॥ (४) सीता—आर्यपुत्रस्य क इव सन्तापः ? शब्दार्थ—उपहारसुमनः=देवताओं के लिए चढ़ाए जाने वाले पुष्प । आकीर्णाः=परिपूर्णा । सम्मार्जितः= स्वच्छ बना । आश्रम पदविभवेन=तपोवन में प्राप्त पुष्प आदि सम्पदा से । अनुष्ठितः=किया है । देवसमुदाचारः=देव- पूजा । बालवृक्षान्=छोटे पेड़ों को । उदकप्रदानेन=जल से सींचने के द्वारा । अनुक्रोशयिष्यामि=प्रसन्न करूंगी । अविघ्नम्=सानन्द । अस्य=सिंचन कार्य का । त्यक्त्वा=छोड़ कर । तां=उस (अयोध्या) को । गुरुणा=पिता दशरथ के द्वारा । मया=मुझ राम के द्वारा । रहिता=सूनी बनी । रम्यां=सुन्दर । पुरीम् =नगरी को । उद्यम्य=प्रयत्नपूर्वक सम्पादित करके । अखिलं=सम्पूर्णां । मत्सन्निधौ= मेरे पास । आगतः=(भरत) आया । गुणनिधिः=गुणों का समूह भरत । तत्र=उसी सूनी अयोध्या में । सम्प्रेषितः=भेजा गया । नृपतेः=राजा का । धुरं=भार । सुमहती=बहुत भारी । एकः=अकेला भरत । समुत्कर्षति= ढो रहा है । विमृश्य=विचार कर के । ईदृशशोकविनोदनार्थम्=इस प्रकार के अर्थात् भरत वियोग जन्य दुःख को दूर करने के लिए । अवस्थाकुटुम्बिनीम्= सभी दशाओं मे साथ रहने वाली (कुटुम्ब धातु चुरादि गण, आत्मनेपदी की अकर्मक धातु है, जिसका अर्थ होता है "धारण करना" इसके लट्, प्र०पु०,