प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 147 ) अन्वय-अनियतात्मा एतत् रूप ग्रहीत्वा नियतं खरवधकृतवैर राघवं वा अह स्वरपदपरिहीणा हव्यधाराम् इव तां जनकनृपसुता हर्तुं कामः । (७) अन्वय—इयं हि पृथिव्या मानुषीणाम् एका अरुन्धती । यस्याः भर्ता खान् नारिभिः सत्कृतः कथ्यते । (८) । अर्थ -कल पिताजी का वार्षिक श्राद्ध दिवस है । पितर लोग सामर्थ्य के अनुसार अपना पिण्डदान चाहते है । उमे मैं किस प्रकार पूरा करूँगा, यही चिन्ता है । अथवा— वे जिस भांति तृप्त होते है, होवे । क्योकि वे मेरी पूरी स्थिति को तो जानते ही है । फिर भी मैं पिताजी की प्रतिष्ठा तथा अपने सामर्थ्य के अनुरूप पितृश्राद्ध करना चाहता हूँ । (५) सीता—आर्यपुत्र, बडे वैभव के साथ पिताजी का श्राद्ध तो भरत करेंगे ही, आप भी अपनी अवस्था के योग्य फल-जल से श्राद्ध करे । पिताजी इसे ही पर्याप्त मान लेगे । सीते, — राम—कुशों पर हमारे हाथों से रखे फलो को देखते ही हमारे वनवास की याद आ जाने से पिताजी वहां पर भी रो देगे । (६) (इसके बाद संन्यासी के वेश में रावण का प्रवेश) रावण—अरे यह, राम ने खर दूषण का वध करके मेरे साथ वैर बढाया है । मैं आज उसे ठगने के लिए अविरक्त होकर भी विरक्त का रूप धारण करता हूँ । मैं सीता का हरण करने उस प्रकार जा रहा हूँ, जिस प्रकार स्वर तथा पद से अशुद्ध मन्त्रोच्चारण हवन की आज्यधारा को हर लेता है । (ऐसी मान्यता है कि मन्त्रदोष से दीयमान हव्यधारा को राक्षस ग्रहण कर लेते है ।) (७) (घूम कर तथा नीचे की ओर देख कर) यह राम के आश्रम के स्थान का द्वार है । तो मै नीचे उतरूं । (उतरता है) अब मै अतिथि के योग्य आचरण करता हूँ । मैं अतिथि हूँ । अरे, यहां कौन है ? राम— (सुन कर) अतिथि का स्वागत है ।