प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 148 ) रावण—इसके स्वर ने रूप को और चमका दिया है । राम—(देख कर) अरे भगवान् हैं ।' भगवान्, प्रणाम । रावण—कल्याण हो । राम--भगवान्, यह आसन है, बैठिए । रावण—(मन मे) इसके द्वारा मे मानो आदेश दिया गया हूँ । (प्रव अच्छा । (बैठता है) राम—सीते महात्मा के लिए पाद्य जल लाओ । सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । (बाहर जाकर और प्रवेश करके) ‧ जल है । राम—महात्मा की सेवा करो । सीता--जैसी आपकी आज्ञा । रावण—(भेद खुलने के भय से हक्का-बक्का होकर) रहने दो, रहने दो । सचमुच मे यह अकेली सीता पृथ्वी पर स्त्रियो मे अरुन्धती के समान पतिव्रता है, जिसके स्वामी होने के कारण स्त्रियाँ आपका यश गाती है । (८) राम—तो फिर लाओ । मैं स्वयं ही सेवा करूंगा । रावण—अरे, छाया के समान सीता से सेवा का निषेध करने वाला में शरीर के समान आपसे कैसे ग्रहण करूंगा । सच्चा अतिथि सत्कार तो मीठे वचनो के स्वागत से होता है । मेरा सम्मान हो गया है । बैठिए । राम--अच्छा । (बैठते हैं) रावण—(स्वागत) तब तक मैं भी ब्राह्मण के अनुरूप कार्य करूँ । (प्रकट) श्रीजी, मैं काश्यप गोत्र का हूँ । मैंने छहों अंग व चारों उपांगो के सहित वेद, मानकीय धर्मशास्त्र, माहेश्वर योगशास्त्र, वृहस्पति का अर्थशास्त्र, मेधातिथि का न्यायशास्त्र और प्रचेता का श्राद्धकल्प इन सबका अध्ययन किया है । राम—क्या कहा ? श्राद्धकल्प । (३) मूल रावणः—सर्वा. श्रुतीरतिक्रम्य श्राद्धकल्पे स्पृहा दर्शिता किमेतत् ? रामः—भगवन् ! भ्रष्टाया पितृसन्तानायामागम इदानीमेष ।