प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 152 ) अन्वय-पुत्रकृतकान् हरिणान् द्रुमान् विन्ध्यं वनं तव दयिता. मखी लताः च आपृच्छ । दीप्तैः इव ओषधिवनैः उपरजितेपु तेपु हिमवद्गिरि काननेषु वत्स्यामि । (११) अन्वय-हिमवान् तान् सौवर्णान् मृगान् मे दर्शयिष्यति, वा मद्बाण- वेगेन भिन्नः क्रौञ्चत्वम् गमिष्यति । (१२) अन्वय-यदि इह स्वयम् आगतः, एतानि तातस्य भाग्यानि । हि एषः पूजायाम् अर्हति । मैथिलि, लक्ष्मण ब्रूहि । (१३) हिन्दी अर्थ रावण-आपने सभी वेद-शास्त्रो को छोट कर श्राद्धकल्प में विशेष उत्कण्ठा प्रकट की है। ऐसा क्यो ? राम-श्रीमन्, पिता से विहीन होने के कारण अभी इसी का ज्ञान अपेक्षित है। रावण-आप संकोच मत करें। आप पूछिए। राम-भगवन्, पिण्डदान के समय पितरों को किससे तृप्त करूॅ ? - रावण-जो कुछ श्रद्धा से दिया जाए, वह श्राद्ध कहलाता है । राम-भगवन्, अनादर से दी गई वस्तु तो परित्यक्त होती है। मेरा प्रश्न विशेष वस्तु के विषय में है। रावण-सुनो, घासो में कुश, ओषधियों में तिल, शाको में मटर, मछलियों मे मगरमच्छ, पक्षियो में वार्ध्रीणस, पशुओ में गाय या गैंडा। ये सारी चीजें मनुष्यो के लिए कही गई है । राम-भगवन् "वा" शब्द से लगता है कि कुछ और वस्तु भी शेष बची है। रावण-हाँ है, किन्तु उसे तो कोई प्रतापी व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है। राम-भगवन्, यही तो मेरा निश्चय है। इस कार्य को पूरा करने के लिए दोनो साधन मेरे पास हैं। यदि तप असफल हुआ तो धनुष और धनुष के असफल होने पर तप। (६) रावण-हैं। किन्तु उनका निवास हिमालय पर है। राम-हिमालय पर। अच्छा इसके आगे। रावण-उनका नाम कांचनपाश्र्व नामक हिरण है। वे हिमालय की मातवी चोटी पर माक्षात् महादेव के मस्तक से गिरने वानी गंगा का जल