भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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वानस=वानप्रस्थ । बाल-खिल्य=एक प्रकार के ऋषि, पुराणों के अनुसार ह्मा के रोम से उत्पन्न ऋषि-समूह, जिनके शरीर का आकार अँगुठे के रावर है, इस समूह में ६० हजार ऋषियों की गणना है और ये सब के सब बड़े तेजस्वी है । नैमिषीय=निमिषारण्य वासी । चिन्तितमात्रोपस्थित- विपन्नैः=सोचने मात्र से आने वाले और मर जाने वाले । अभिवर्धयन्ति= सम्पन्न करते हैं । तर्पिता.=सन्तुष्ट बने । सुतफल=पुत्रजन्म के प्रयोजन को । हित्वा=नष्ट करके । जरां=बुढ़ापे को । खम्=स्वर्ग मे । उपयान्ति=चले जाते हैं । दीप्यमानाः=तेज से चमकते हुए । समुपयान्ति=प्राप्त करते हैं । आवर्तिभिः= जन्म मरण के चक्र वाले । विषयैः=भोग विलास की वस्तुओ से । बलात् = जबर्दस्ती । ध्रियन्ते = खीचे जाते है । आपृच्छ=विदा ले लो । पुत्रकृतकान् = पुत्र तुल्य पाले जाने वाले । विन्ध्यं=विन्ध्य पर्वत से । सखी =सखियां बनी । दयिता =प्रिय (स्त्रीलिंग, द्वितीया, बहुवचन) । लताः =वल्लरियों से । वत्स्यामि = निवास करू गा । हिमवद्गिरिकाननेषु=हिमालय के वनों मे । दीप्तंः इव = प्रज्वलित हुई के समान । ओषधिवनं =वनस्पतियो के वन वाले । उपरंजितेषु=प्रकाशमान । अतिमनोरथेन=मानुषी सीमा के पार वाली अभि- लाषा से । दृश्यन्ते=देखे जाते है । सौवर्णान्=काचनपार्श्व नामक । दर्शयिष्यति =दिखाएगा । भिन्न =विदीर्ण हुआ । क्रौञ्चत्वम्=क्रौंच पर्वत तुल्य दशा को (एक बार परशुराम और कार्तिकेय दोनो महादेव से अस्त्र वेद का सविधि अध्ययन कर रहे थे । इनमें विद्या के तारतम्य का संघर्ष उपस्थित हुआ। महादेव ने परीक्षा के लिए तय किया कि जो इस पर्वत को वाणों द्वारा भेद देगा, उसे प्राथम्य प्राप्त होगा । परशुराम ने ऐसा ही किया ।) अवलेपः= शूरवीरता का गर्व । विद्युत्सम्पात =बिजली की चमक । इहस्थम्=यही विद्यमान । वृद्धि =प्रभाव । दिष्ट्या=सौभाग्य से (अव्यय) । वर्धते=विजयते । अर्हति = योग्य है । ब्रूहि=कहो । अन्वय—उभयस्य सान्निध्यम् अस्ति, एतत् यदि साधयिष्यति । तपसि श्रान्ते धनुः वा धनुषि श्रान्तेः । (६) अन्वय—तैः तर्पिताः पितरः सुतफलं लभन्ते, हि दीप्यमानाः जरां हित्वा खम् उपयान्ति । सुरैः तुल्यं विमान वासं समुपयान्ति च आवर्तिभिः विषयैः बलात् न ध्रियन्ते । (१०)