प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 178 में से
संदर्भ में पढ़ें( 156 ) राम-- तब तो मैं ही जाऊँगा । सीता-आर्यपुत्र, मैं क्या करूँगी ? राम-भगवान् (इस संन्यासी) की सेवा । सोता-जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । ( राम निकल जाते हैं ) रावण--अरे, यह राम अभी तो मेरे लिए अर्घ्य लेकर आ रहे थे और ये अब बिना पूजा किए ही दौड़ते हुए हरिण को देखकर उस पर धनुष चढ़ा रहे हैं । अहा, कैसी असीम शक्ति, कैसा असीम पराक्रम, कैसा असीम धैर्य और कैसा असीम वेग है । "राम" इन थोड़े से अक्षरों से मानो उचित रूप मे ही यह पूरा संसार व्याप्त हो रहा है । (१४) यह हरिण एक ही छलांग मे वाण के निशाने से बाहर होकर घने वन में घुस गया । सीता-(अपने मन मे) यहां पर पतिदेव के अभाव मे मुझे भय लग रहा है । रावण-(अपने मन मे) राम को छल-कपट से दूर करने पर मैं इस आश्रम से अकेली रोती हुई बाला सीता को मन्त्र के उच्चारण से शून्य आहुति की भांति हरण करता हूँ । (१५) सीता-तो फिर पर्णशाला में प्रवेश करती हूँ । (जाना चाहती है) रावण-(अपना रूप धारण करके) सीते ठहरो, ठहरो । सीता-(डर कर) यह अब कौन है ? रावण-क्या तू नहीं जानती ? युद्ध में जिसने दानवों और देवताओं को परास्त किया, जिसने इन्द्र आदि को जीता, जिसने शूर्पणखा की नासिका भंग को देखा, जिसने खर और दूषण भाइयों का मारा जाना सुना, वही मैं रावण इस समय गर्व से दुष्ट बुद्धि एवं अतुलनीय शक्ति वाले राम को माया से ठग कर हे विशाल नेत्रों वाली सीते, तुम्हे हर कर ले जाने के लिए उपस्थित हुआ हूँ । (१६) (5) मूल सीता--हं रावणो नाम । (प्रतिष्ठते) रावणः--आः ! रावणस्य चक्षुर्विषयमागता क्व यस्यासि ? सीता--आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व । परित्रायस्व ।