प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 188 ) सीता—हूं । आज भी मुझे विश्वास नही होता । (पास जाकर) आर्यपुत्र की जय हो । रामः—सीते, क्या जानती हो, पहले हम इस जनस्थान मे रहा करते थे । क्या तुम पुत्र के समान पाले गए इन वृक्षों को पहचानती हो ? सीता—जानती हूँ, जानती हूं । जिन वृक्षों को छोटे-छोटे पत्तो वाली स्थिति मे देखा था, अब वे नेत्र ऊपर करके देखने योग्य हो गए हैं । राम—ऐसा ही है । समय सचमुच अन्तर उत्पन्न कर देता है । सीते, याद है, इस सप्तपर्ण वृक्ष के नीचे श्वेत वस्त्र पहने हुए भरत को देख कर हरिणों का झुण्ड भयभीत हो गया था । सीता—आर्यपुत्र, अच्छी तरह से याद है । राम—और यह हमारी तपस्या का साक्षी बना हुआ विशाल सरोवर है । यही बैठ कर हमने पिताजी की श्राद्ध क्रिया की चिन्ता करने के समय कांचनपार्श्व नामक हिरण को देखा था । सीता—हूँ, आर्यपुत्र, उसका आप नाम मत लीजिए, मत लीजिए । (भयभीत होकर कांपती है ।) राम—मत घबराओ, मत घबराओ वह समय तो बीत गया । (चारों ओर देख कर) अरे, यह क्या है ? लोध्रपुष्प के समान सफेद धूल उड रही है । वह हवा से प्रसारित की हुई चारो दिशाओं को ढक रही है । यह शंख ध्वनि वाद्य यन्त्रो तथा शूर वीरों के गर्जन से वृद्धि को प्राप्त करके इस शान्त तपोवन को नगर का रूप दे रही है । (४) (३) मूल (प्रविश्य) लक्ष्मणः—जयत्वार्यः ! आर्य ! अयं सैन्येन महद्वता त्वग्दर्शनसमुत्सुकः । मातृभिः सह सम्प्राप्तो भरतो भ्रातृवत्सलः ॥ (५) रामः—वत्स लक्ष्मण ! किमेवं भरतः प्राप्त इति ? लक्ष्मणः—आर्य ! अथ किम् । रामः—मैथिली ! श्वश्रूजनपुरोगं भरतमवलोकयितुं विशालीक्रियतां ते चक्षुः ।