प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 178 में से
संदर्भ में पढ़ें( 15 ) शब्द और श्रथ का सामंजस्य सुन्दर रूप मे घटित हुआ है । नाटकीयता का सन्निवेश सुरुचिपूर्ण ढंग से किया गया है । भास का काव्यत्व नाटकत्व का पूरक है । इनके पात्रो के सवाद संक्षिप्त, उचित, श्रवसरानुकूल तथा कथावस्तु के परिवृहरण में सहायक है । नाटकीय कुतूहल सर्वत्र पाया जाता है । भाषा मे श्रपूर्व प्रवाह श्रौर सरलता विद्यमान है । गागर मे सागर भरने वाली उक्ति इनकी रचनाश्रो मे चरितार्थ है । इनका कथन क्षण भर में गुह्यतम गुत्थियों का समाधान, मानसिक भावनाश्रो की सुख मे परिणति तथा विचारो को सक्षिप्त रूप मे रखते हुए भाव की स्पष्टता को करने वाला है । श्रनुकरणीय शैली—भास की शैली मे भावाभिव्यक्ति की पूर्ण क्षमता है । श्रत आद्य नाटककार होने पर भी भास की शैली पूर्ण गंभीर और प्रौढ़ है । इसका अनुकरण कालिदास, हर्ष, भवभूति आदि नाटककारो ने भी किया है । निष्कर्ष—हम सक्षेप मे भास की शैली की विशेषताश्रो को इस प्रकार बद्ध कर सकते है— (1) स्वच्छता श्रौर सक्षिप्तता (2) प्रभावोत्पादकता व व्यजकता का मणिकांचन योग (3) श्रल्पसमास या समासहीन वाक्य संघटना (4) सरलता श्रौर सहज बाधगम्यता (5) श्रौचित्य एवं पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग (6) लोकोक्तियो एवं सूक्तियो का प्रचुर प्रयोग (7) घटनाश्रो का श्राकस्मिक वितरण (8) स्वल्प शब्दो द्वारा श्रधिक भाव व्यजना (9) श्रकृत्रिमता श्रौर स्वाभाविकता का समावेश