भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 178 में से

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( 45 ) चेटी—महारानी, मैने ऐसा सुना है । आर्य बालाकि कंचुकी कह रहे थे—राजतिलक है, राजतिलक है । सीता—हां, किसी का राजतिलक होगा । (दूसरी चेटी का प्रवेश) चेटी--महारानी, शुभ समाचार है, शुभ समाचार है । सीता--क्या बात है । क्या मन मे रख कर बोल रही है ? चेटी—सुना है राजकुमार का अभिषेक हो रहा है । सीता—पिताजी सकुशल तो है ? चेटी--महाराज ही तो अभिषेक करा रहे है । सीता—यदि ऐसा है, तो मैने दूसरी शुभ सूचना सुनी । अपना आंचल फैला । चेटी--महारानी, जो आज्ञा । (वैसा ही करती है) सीता—(अपने आभूषण उतार कर देती है ।) चेटी--महारानी, बाजे की आवाज सी सुन रही हूं । सीता—हा, वही है । चेटी--अचानक बाजे बजने बन्द हो गये । सीता—अभिषेक मे कौन सा विघ्न आ पड़ा ? अथवा राजपरिवारो मे अनगिनत घटनाएं होती ही रहती है । चेटी--महारानी, मैंने ऐसा सुना है कि राजकुमार का तिलक करके महाराजा वन में चले जायेगे । सीता—यदि ऐसा है, तो फिर यह अभिषेक का जल न होकर मुंह के आंसू धोने का पानी होगा । (४) मूल (ततः प्रविशति रामः) रामः--हन्त भोः ! आरब्धे पटहे स्थिते गुरुजने भद्रासने लंघिते स्कन्धोच्चारण-नम्यमानवदन-प्रच्योतितोये घटे । राज्ञाहूय विसर्जिते मयि जनो धैर्येण मे विस्मितः स्वः पुत्रः कुरुते पितुर्यदि वचः कस्तत्र भो विस्मयः ॥ (५) "विश्रम्यतामिदानीं पुत्रे" ति स्वयं राज्ञा विसर्जित—स्याप- नीतभारोच्छ्वसितमिव मे मनः । दिष्ट्या स एवास्मि राम.,

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