भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 178 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

( 56 ) से कहा कि भरत का राज्य सिंहासन पर अभिषेक कर दो। इसमें लोभ नहीं है ? राम--आर्य, (हमारी ओर अधिक स्नेह होने के कारण ही आप वास्तविक्ता को नहीं देख रहे है। क्योकि, यदि विवाह के मूल्य मे पुत्र लिए विशेष-रूप से सम्भावित राज्य को मागा जाता है, तो इसमे उसका लोभ है और भाई के राज्याधिकार को लेने वाले हम लोग क्या लोभ रहित है ? (१५) काञ्चुकीय--किन्तु । राम--मैं इसके आगे जननी की निन्दा नही सुनना चाहता हूँ । त फिर महाराजा के समाचार कहो । काञ्चुकीय--इसके बाद फिर, राजा के द्वारा दुःख के कारण बिना कुछ बोले ही मैं हाथ के सकेत : आपके पास भेजा गया हूँ । राजा उस स्थिति की अपेक्षा कुछ अधिक अच्छी लगने वाली मूर्च्छा को प्राप्त हो गए, ऐसा मेरा विचा- है । (१६) (८) मूल (नेपथ्ये) कथं कथ मोहमुपगत इति ? यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दया रामः-- (आकर्ण्य पुरतो विलोक्य) अक्षोभ्यः क्षोभितः केन लक्ष्मणो धैसार्यगरः । येन् रुष्टेन पश्यामि शताकीर्णमिवाग्रत. ॥ (१७) (ततः प्रविशति धनुर्वाणपाणिर्लक्ष्मणः) लक्ष्मण.- (सक्रोधम्) कथ कथं मोहमुपगत इति । यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दया (स्वजननिभृत. सर्वोऽप्येव मृदुः परिभूयते । अथ न रुचित मुञ्च त्वं मामहं कृतनिश्चयो युवतिरहित लोकं कर्तुं यतश्छलित वयम् ॥ (१८) सीता--आर्यपुत्र ! रोदितव्ये काले सौमित्रिणा धनुगृहीतम् । अपूर्व खल्वस्यायास. । रामः-- सुमित्रामातः ! किमिदम् ।