भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 178 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 58

( 55 )

ही अर्थ (प्रवेश करके) ञ्चुकीय—कुमार, रक्षा करे, रक्षा करे। राम—आर्य, किसकी रक्षा ? ञ्चुकीय—महाराज की। म— क्या महाराज की ? तब तो यो कहिए कि एक ही शरीर मे बंधी हुई पृथ्वी की रक्षा की जाए। किन्तु यह आपत्ति आई कहा से ? ाञ्चुकीय—अपने ही परिवार के व्यक्ति से। ाम—क्या आत्मीय जन से ? तब तो इसे दूर करने का उपाय नही है। शत्रु तो केवल शरीर पर आक्रमण करता है, किन्तु आत्मीय जन मर्म स्थान पर आघात करते हैं। न जाने इस विपत्ति मे कौन स्वजन निमित्त बना है, जो मेरे लिए लज्जा उत्पन्न करेगा। (१२) काञ्चुकीय—महारानी कैकेयी। राम—क्या मेरी जननी ? तब तो अवश्य ही इसका परिणाम अच्छा होगा। काञ्चुकीय—किस प्रकार ? राम—सुनिए, जिसके पतिदेव इन्द्र के समान हो और जिसका मै पुत्र होऊँ। भला उसे क्या कामना हो सकती है ? जिसके लिए वे ऐसा बुरा कार्य करेगी। काञ्चुकीय हे राजकुमारः स्वभावतः मारी गई नारी बुद्धि पर अपने सीधेपन का आरोप मत करो। उसी के कहने से तो आपका अभिषेक रुक गया है। राम—आर्य, इसमें तो बहुत सी अच्छाइया है। काञ्चुकीय—वे किस प्रकार हैं ? राम—सुनिए, सर्वप्रथम तो महाराज का वन जाना रुक गया। मुझ पर पिता की छत्रच्छाया बनी रही, उसी प्रकार का बालभाव अर्थात् पूर्ववत् सुख की स्थिति विद्यमान रही। नया राजा पता नहीं अच्छा होगा या बुरा, यह आशंका भी प्रजागण को नही है और मेरे अन्य भाई भी राज्य के उपभोग के आनन्द से वंचित नही रहे। (१४) काञ्चुकीय—किन्तु उस कैकेयी ने बिना बुलाए ही जाकर राजा दशरथ