भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 178 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 64

( 65 ) अन्वय-वधूसहायं सौभ्रातृव्यवसितलक्ष्मणानुयात्रम् ते वनगमनं उत्थाय जीर्णः क्षितितलरेगुरूषिताङ्गः कान्तारद्विरदः इव उप- (३०) अन्वय—चीरमात्रोत्तरीयाणा वनवासिना किं दृश्यम् । राजा अस्मासु नः शिरःस्थानानि पश्यतु ॥ (३१) अर्थ ण—आप प्रसन्न होइए । आज तक आप सभी प्रकार के वस्त्र, आभूषण, माला आदि सभी पदार्थों मे से आधा देतेआए है । फिर अकेले ही इस वल्कल को क्यो बांध लिया है । क्या इस वल्कल में आप लोभी बन गए है । (२६) —हे सीते, इसे रोको । ता—लक्ष्मण, तुम रुक जाओ । मण—आर्य, तुम अकेली ही मेरे पूज्य राम के चरणों की सेवा करना चाहती हो । दाहिना पांव तुम्हारा है । मेरा बाया होगा । (२७) ता—आप पतिदेव दया करे । लक्ष्मण दुःखी हो रहा है । म—हे लक्ष्मण, सुनो । यह वल्कल—तपस्या रूपी युद्ध में कवच के समान, संयम रूपी हाथी को वश करने में अंकुश, इन्द्रिय रूपी घोडो के लिए लगाम तथा धर्म रूपी रथ का सारथी है, अतः तुम इनको ग्रहण करो । (२८) क्ष्मण—कृतकृत्य । (ले —इस समाचार मार्ग पर एकत्रित हो — है । इन्हे