भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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( 62 ) इस सेविका के द्वारा दिये गए ये वल्कल वस्त्र मुझे शुभ कार्य करने के लिए दो । मैं दूसरे राजाओं द्वारा नही प्राप्त किए गए और न किए गए आचरण को करूँगा । (२४) सीता--आर्यपुत्र लीजिए । राम- हे सीते ! तुमने क्या निश्चय किया है ? सीता-मैं तो आपकी सहधर्मचारिणी हूँ । राम-मुझे तो अकेले को ही जाना है । सीता-इसीलिए तो आपके साथ चल रही हूँ । राम-वहाँ तो जगल में रहना पड़ेगा । सीता-वह मेरे लिए राजमहल होगा । राम-तुमको सास-ससुर की सेवा भी तो करनी चाहिए । सीता-इसके लिए मैं देवताओ को प्रणाम करती हूँ । राम- हे लक्ष्मण, इसे रोको । लक्ष्मण-आर्य, ऐसे सम्माननीय अवसर पर इन देवी को नही रोक सकता हूँ क्योकि— राहु के द्वारा चन्द्रमा के ग्रहण कर लेने पर भी रोहिणी चन्द्रमा के साथ रहती है । वन मे वृक्ष के गिर जाने पर उसके साथ लिपटी हुई लता भी पृथ्वी पर आ जाती है । हथिनी कीचड़ मे सने हाथी को नही छोड़ती है । अत. यह सीता भा वन जाए और अपने धर्म (कर्त्तव्य) का आचरण करे क्योकि स्त्रियो के लिए तो पति ही सर्वस्व होते है । (२५) (प्रवेश करके) चेटी—महारानी की जय हो ! सज्जागृह की रक्षिका आर्या रेवा प्रणाम करके सूचित करती है कि अवमातिका मगीतशाला से कुछ वल्कल वस्त्र स्वय ही ले आई है । हो सकता है कि वे अच्छे नही हो । ये दूसरे नये वल्कल है । इनसे आप अपना प्रयोजन पूरा कर लीजिए । राम-भद्रे, इधर लाओ । यह तो सतुष्ट है । मुझे आवश्यकता है । चेटी-स्वामी ग्रहण करें । (उन्हे देकर निकल जाती है ।) (राम लेकर पहनते है ।) (१०) मूल लक्ष्मणः—प्रसीदत्वार्यः ।