भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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(5) शताब्दी माना है । भास के काल-निर्णय के सम्बन्ध में निम्नांकित बिन्दु अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं— (1) प्रतिज्ञायौगन्धरायण, अविमारक एवं स्वप्नवासवदत्त में जिन प्राचीन राज्यों का उल्लेख किया है, उनका अस्तित्व मौर्य युग के पूर्व महापद्म नन्द के समय अर्थात् ई. पू 384 में वर्तमान था । चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में छोटे-छोटे गणतन्त्र विलीन होकर बृहत्तर भारत में मिल गए थे । फलतः भास द्वारा उल्लिखित राज्यों के आधार पर उनका समय ई. पू. चौथी सदी माना जा सकता है । (2) भास ने दर्शक के समय में मगध की राजधानी राजगृह को बताया है । अजातशत्रु के समय में मगध की राजधानी राजगृह से हटकर पाटलिपुत्र में स्थापित हो गई थी । अतः भास का काल मौर्यकाल से पूर्व है । (3) भास की रचनाओं में भरत के नाट्यशास्त्र के नियमों का विरोध पाया जाता है, जैसे— (अ) भरत ने प्रस्तावना में नान्दी पाठ के अनन्तर काव्य के नाम- निर्देश का निरूपण किया है किन्तु भास की रचनाओं में यह नहीं मिलता । (ब) नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रतिज्ञायौगन्धरायण चार अंकों का होने से तथा दिव्यस्त्री कारणोपगत युद्ध होने से ईहामृग होना चाहिए, पर नाटक- कार ने स्वयं ही इस नाटक के प्रारम्भ में इसे प्रकरण कहा है । (स) भरत ने मंच पर युद्ध, वध, आक्रमण एवं रुदन का निषेध किया है । जबकि बालचरित में दामोदर द्वारा अरिष्टर्षभ्, मुष्टिका वध, ऊरुभंग में दुर्योधन भीम युद्ध तथा अभिषेक में राम-रावण युद्ध वर्णित है । प्रतिमा में दशरथ की मृत्यु, अभिषेक में वाली की मृत्यु तथा विभिन्न स्थानों पर शयन आदि का वर्णन आया है । इससे स्पष्ट है कि भास ने नाट्यशास्त्र के नियमों का अनुसरण नहीं किया है । अतएव भास को भरत से पूर्ववर्ती स्वीकार करना तर्कसंगत है । (4) भास वात्स्यायन एवं उसके कामसूत्र से अपरिचित है । इसके नाटकों में आए प्रेमसन्दर्भों में बाभ्रव्य का ही अनुकरण किया गया है । बाभ्रव्य ने मन्दिर गमन, भ्रमण, उद्यान विहार, जलक्रीड़ा, विवाह, उत्सव, पर्व दुर्घटना, अग्निकांड, चोरी, दृश्यदर्शन हेतु गमन आदि द्वारा प्रेमोद्भव का कथन किया