भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 178 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81

( ४० ) राजा—नहीं, नही, कानो को आनन्द देने वाले तथा दुःखी हृदय को शान्त करने वाले उनके नाम लेकर ही सन्देश सुनाओ । सुमन्त्र—जैसी महाराज की आज्ञा । चिरजीवी राम । राजा—क्या राम । यह राम । इसका नाम सुनने से तो लगता है कि मैने उसे हृदय से लगा लिया है । इसके बाद । सुमन्त्र—दीर्घायु लक्ष्मण । राजा—यह लक्ष्मण । इसके आगे । सुमन्त्र—आयुष्मती जनकराजकुमारी सीता । राजा—यह सीता । राम, लक्ष्मण, सीता यह क्रम ठीक नही है । सुमन्त्र—तो फिर कौन सा क्रम उचित है । राजा—राम, सीता और लक्ष्मण, यो कहो । यहाँ नामोच्चारण में भी सीता राम और लक्ष्मण के बीच मे रहे । वन मे बहुत से भय हुआ करते हैं, अतः इस प्रकार वह सुरक्षित रहेगी । (१५) सुमन्त्र—जैसी महाराज की आज्ञा । दीर्घायु राम । राजा—यह राम । सुमन्त्र—आयुष्मती सीता । राजा—यह वैदेही । सुमन्त्र—चिरजीवी लक्ष्मण । राजा—यह लक्ष्मण । राम, सीते, लक्ष्मण । हे पुत्रो, तुम मेरा आलिङ्गन करो । मैं एक बार राम से मिलूँगा अथवा फिर एक बार राम को देखूँगा । इस सम्भावना से मैं उसी प्रकार जी रहा हूँ, जैसे मरणासन्न अमृत से । सुमन्त्र—शृङ्गवेरपुर में रथ से उतर कर, अयोध्या की ओर मुख किए हुए खड़े होकर, सभी ने महाराज को सिर झुका कर प्रणाम करके कुछ कहना प्रारम्भ किया । बहुत समय तक न जाने कौन सी बात को सोचते रहे । कुछ कहने के लिए उनके ओष्ठ फड़के । किन्तु अश्रुओं से गले के अवरुद्ध हो जाने के कारण वे बिना कुछ कहे हुए ही वन में चले गए । (१७)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक) · पृष्ठ 81, कुल 178 में से · BharatKosha