भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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( ९२ ) करेगा और मैं जानते हुए भी इसे नही बता पा रहा हूं । क्योकि, पिता दशरथ की मृत्यु, माता कैकेयी का राज्यलोभ और वडे भाई राम का वनवास इन तीनो दोषों को कौन कहेगा । (४) (प्रवेश करके) भट - राजकुमार की जय हो । भरत-भद्र, क्या शत्रुघ्न मेरे पास श्रा रहे हैं । भट- हां, राजकुमार तो श्रापके पास श्रा ही रहे हैं । किन्तु उपाध्यायों ने श्रापसे कहा है । भरत - क्या कहा है, क्या कहा है ? भट- कृत्तिका का एक दण्ड (६० पल या २४ मिनट का काल=नाडी या नाडिका) रह गया है । उसके बीत जाने पर रोहिणी मे कुमार श्रोयोध्या मे प्रवेश करे । भरत-बहुत अच्छा । मैंने गुरुजनो के वचन पहले कभी नही टाले । तुम चलो । भट - जैसा राजकुमार श्रादेश देते हैं। (निकल जाता है) (३) मूल भरतः- अथ कस्मिन् प्रदेशे विश्रमिष्ये । भवतु दृष्टम् । एतस्मिन् वृक्षान्तराविष्कृते देवकुले मुहूर्तम् विश्रमयिष्ये । तदुभयं भविष्यति-दैवतपूजा विश्रमश्च । अथ च उपोपविश्य प्रवेष्ट- व्यानि नगराणीति सत्समुदाचारः । तस्मात् स्थाप्यताम् रथः । सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (रथं स्थापयति) भरतः- (रथादवतीर्य) सूत ! एकान्ते विश्रामयाश्वान् । सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (निष्क्रान्तः) भरतः- (किञ्चिद गत्वावलोक्य) साधुमुक्तपुष्पलाजाविष्कृता वलयः, दत्तचन्दनपञ्चाङ्गला भित्तयः, अवसक्तमाल्यदामशोभीनि द्वाराणि, प्रकीर्णा वालुकाः । किं नु खलु पार्वणोऽयं विशेषः श्रथवा आह्निक मास्तित्वयम् ? कस्य नु खलु दैवतस्य स्थानं भविष्यति । नेह किञ्चित् प्रहरणं ध्वजो वा बहिश्चिह्नं दृश्यते । भवतु प्रविश्य ज्ञास्ये । (प्रविश्यावलोक्य) अहो