प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
( 196 ) पुष्पकं दिवि रावणस्य विमानम्। कृतसमयमिद स्मृतमात्र- मुपगच्छतीति । तत् सर्वैरारुह्यताम् । (सर्वे आरोहन्ति) रामः—अद्यैव यास्यामि पुरीमयोध्या सम्बन्धिमित्रैरनुगम्यमानः । लक्ष्मणः - अद्यैव पश्यन्तु च नागरास्त्वा चन्द्रं सनक्षत्रमिवोदयस्थम् ॥ (१४) (भरतवाक्यम्) यथा रामश्च जानक्या बन्धुभिश्च समागतः । तथा लक्ष्म्या समायुक्तो राजा भूमिं प्रशास्तु नः ॥ (१५) (निष्क्रान्ताः सर्वे) इति सप्तमोऽङ्कः । शब्दार्थ—कृताभिषेकः = राज्याभिषेक किए हुए । तुष्टिं सन्तोष को । उपगच्छ = प्राप्त करो । विमुञ्च = परित्याग करो । दैन्यम् = चिन्ता को । अभिलषितं=इच्छित । भुवि=पृथ्वी पर । सत्कृतभारवाही = सम्मानपूर्ण कार्य का वाहक । धर्मेण=धर्मपूर्वक । लोकपरिरक्षणं=प्रजा का संरक्षण । अभ्यु- पेतम्=स्वीकार कर लिया । अधिगतनृपशब्द = राजा शब्द को प्राप्त कर लिया । धार्यमाणातपत्र = राजच्छत्र को धारण कर लिया । विकसितकृत- मौलिम् = मस्तक को उन्नमित किया । तीर्थतोयाभिषिक्तं = तीर्थों के जल से स्नान करने वाले । गुरुम्=पूज्य राम को । अधिगतलीलम् = लक्ष्मी को प्राप्त करने वाले । वन्द्यमानम् = प्रणाम किए जाते हुए । जनौघैः = लोक समूह के द्वारा । नवशशिनम् इव=दूज के चाँद की भाँति । पश्यतः = देखते हुए । तृप्तिः=सन्तोष । नष्टकल्मषं = कलङ्कहीन । प्रकांशनाम् - दीप्तिशालिता को । याति = प्राप्त करता है । सोमस्य इव = चन्द्रमा के समान । उदये = उदय- के समय । जगत् = संसार । अधिगतराज्यः = राज्य प्राप्त करने वाला । वर्धन्ते = वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं । मैन्द = एक वानर का नाम । जाम्ब- वत्=एक भालू का नाम । हनूमत् = हनुमान । अनुगच्छन्तः=पीछे आते हुए ।
( 197 )
सहायानां = सहायकों की । प्रसादात् = कृपा से । अभ्युदयं = राज्याभिषेक रूपी महोत्सव को । धन्या = पुण्यशालिनी । प्रेक्षितुं = देखने की । द्रक्ष्यति = देखोगी । भवती = देवी । प्रभाभिः = तेज के द्वारा । अखिल = समूचा । सूर्यवत् = सूर्य के समान । प्रतिभाति = प्रकाशित हो रहा है । विभाव्य = विचार कर के । सम्प्राप्तम् = आ पहुँचा है । पुष्पकं = विमान का नाम । कृतसमय = संकेत देने पर । स्मृतमात्रं = स्मरण काल मे । उपगच्छति = समीप जाता है । आरु- ह्यताम् = आरोहण किया जाए । यास्यामि = जाऊँगा । नागराः = नगर निवासी । त्वाम् = राम को । सनक्षत्रम् = अन्य तारा गणों के साथ । उदय- स्थम् = उदयाचल पर विद्यमान । जानक्या = सीता के साथ । समायुक्तः = परिपूर्ण होकर । प्रशास्तु = पालन करें । नः = हमारे । अन्वय-स्वर्गे अपि तुष्टिम् उपगच्छ । दैन्यं विमुञ्च । त्वया मयि यत् कर्म अभिलषितम् तत् एतत् (निवृत्तम्) । किल भुवि सत्कृतभारवाही राजा अस्मि । धर्मेण लोकपरिरक्षणम् अभ्युपेतम् । (११) अन्वय —अधिगतनृपशब्दम् , धार्यमाणातपत्रम्, विकसितकृतमौलिम्, तीर्थतोयाभिषिक्तम्, गुरुम् अधिगतलीलम् जनौघैः वन्द्यमानम् नवशशिनम् इव आर्यम् पश्यतः मे तृप्तिः न (जायते) । (१२) अन्वय—आर्याभिषेकेण नष्टकल्मषम् मे एतत् कुलम् सोमस्य उदये जगत् इव पुनः प्रकाशतां याति । (१३) अन्वय —अद्य एव अयोध्यां पुरीम् सम्बन्धिमित्रैः अनुगम्यमानः यास्यामि । च अद्य एव नागराः उदयस्थं सनक्षत्रं चन्द्रम् इव त्वाम् पश्यन्तु । (१४) अन्वय—यथा रामः जानक्या बन्धुभिः च समागतः, तथा लक्ष्म्या समायुक्तः नः राजा भूमिम् प्रशास्तु । (१५) हिन्दी अर्थ (इसके बाद अभिषेक किए हुए राम का परिवार के साथ प्रवेश) राम — (आकाश की ओर देखकर) हे पिताजी, आप अब स्वर्ग मे आनन्द प्राप्त करें तथा सन्ताप को भूल जाएं ।
( 198 ) आपने मेरा राज्याभिषेक करना चाहा था, वह अब पूरा हुआ। अब मैं पृथ्वी पर पुण्य भार का वहन करने वाला राजा बन गया हूं। मैंने न्यायपूर्वक प्रजापालन का उत्तरदायित्व स्वीकार कर लिया है। (११) भरत— महाराज की पदवी प्राप्त करने वाले, राजच्छत्र ग्रहण करने वाले, प्रकाशमान मुकुट पहनने वाले, तीर्थों के जल से अभिषेक स्वीकार करने वाले, पूजनीय, राजलक्ष्मी को प्राप्त करने वाले, प्रजाओ के समूहों से जय-जयकार की ध्वनि वाले, नये चन्द्रमा की भाँति आर्य राम को देखते हुए मुझे तृप्ति नही हो रही है । (१२) शत्रुघ्न— जिस प्रकार चन्द्रमा के उदय से सारा ससार प्रकाशित होने लगता है, उसी प्रकार आर्य राम के राज्याभिषेक से निष्कलक मेरा यह रघुकुल फिर से प्रकाशमान हो रहा है। (१३) राम— वत्स लक्ष्मण, अब मैंने राज्य पा लिया है। लक्ष्मण— सौभाग्य की बात है कि आप वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं। (प्रवेश करके) काञ्चुकीय— महाराज की जय हो। ये श्रीमान् विभीषण सूचित करते हैं कि सुग्रीव, नील, मैन्द, जाम्बवान्, हनुमान् आदि आपके अनुचर निवे- दन कर रहे है— "अहोभाग्य, आपको बधाई।" राम— उनमे कह दो कि "आप सहायकों की कृपा से सब विजय है।" काञ्चुकीय-- जैसी महाराज की आज्ञा। कैकेयी— मैं सौभाग्यशालिनी हूं। इस वैभव को मैं अयोध्या मे भी देखना चाहती हूँ। राम— आप देखेंगी। (देखकर) अरे, यह समूचा तपोवन सूर्य के समान कान्ति से देदीप्यमान हो रहा है। (विचार कर के) अच्छा समझ गया। आकाश मे रावण का पुष्पक विमान आ गया है। यह ठीक समय पर याद करने मात्र से उपस्थित हो जाता है। तो आप सब इस पर चढिए। (सब चढते हैं)
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